फर्ज कीजिए कि आपसे कोरिया का कोई नागरिक मिले और धारा प्रवाह हिंदी में बात करने लगे तो एकबारगी आपको हैरानी होगी। डॉ एचएच किम से आपकी पहली मुलाकात ऐसी ही चौकाने वाली हो सकती है। डॉ. किम दक्षिण कोरिया दूतावास में वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह न सिर्फ हिंदी में सहजता से बातचीत करते हैं, बल्कि दूतावास में तैनात अपने सहकर्मियों को हिंदी बोलने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं। उनका सूक्त वाक्य है कि अगर भारत को जानना है तो हिंदी सीखना व समझना पड़ेगा।
डॉ. किम की हिंदी सीखने के पीछे की वजह भी बड़ी दिलचस्प है। कोरियाई गणराज्य की सेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद वह एक बार भारत में कोराबार के सिलसिले में आए थे। नेहरू प्लेस मार्केट में इलेक्ट्रानिक सामानों की लेन-देन की बात करते हुए उनको समझ में आया कि अगर हिंदी जानते होते तो बेहतर तरीके से मोलभाव कर सकते थे। द्विभाषिए की मदद उनको ज्यादा कारगर नहीं लगी। दुकानदारों के हावभाव से लग रहा था कि उनसे ज्यादा रकम ली जा रही है।
इसके बाद डॉ. किम को हिंदी सीखने की धुन सवार हो गई। उन्होंने न सिर्फ हिंदी समझना, बल्कि बोलना लिखना और पढना भी सीख लिया। गुणा-गणित करने के लिए उन्होंने हिंदी अंकों को भी बखूबी सीखा है। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उनकी कोरियाई दूतावास में नियुक्ति हुई तो मौका मिलने पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया युनिवर्सिर्टी से पीएचडी कर डाली।
डॉ. किम कोरिया से आने वाले अधिकारियों, छात्रों व राजनयिकों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। कई बार अपने ऑफिस में वह हिंदी की क्लास लगाए बैठे दिखते हैं। भारत और हिंदी उनको इतनी पसंद आई कि भारत बोध पर एक पुस्तक तैयार करने की योजना तैयार की। इसका ज्यादातर हिस्सा तैयार है। इसमें भारत की सामाजिक व सांस्कृतिक आयोजनों की सचित्र जानकारी है। किम हिंदी गानों के शौकीन हैं और सार्वजनिक कार्यक्रम में संबोधन भी हिंदी में देते हैं।