-15वें दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (डिफ) के तीसरे दिन डॉक्यूमेंट्री की दृष्टि: सत्य, प्रयोग या दृष्टिकोण विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा हुई
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। बदलते समय के साथ सिनेमा की भाषा भी रूपांतरित हो रही है, लेकिन सच और दृष्टिकोण के बीच संतुलन की चुनौती आज भी कायम है। इसी संदर्भ में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित 15वें दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (डिफ) के तीसरे दिन डॉक्यूमेंट्री की दृष्टि: सत्य, प्रयोग या दृष्टिकोण विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा हुई।
इस संवाद में लेखक और फिल्म निर्माता अभय मिश्रा के साथ फिल्म निर्माता राजेश अमरोही ने अपने विचार साझा किए। जबकि संचालन तृप्ति श्रीवास्तव ने किया। चर्चा में डॉक्यूमेंट्री सिनेमा की प्रकृति, उसकी निष्पक्षता, वैचारिक पक्ष और समकालीन मीडिया परिदृश्य में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श हुआ।
वक्ताओं ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि एक संवेदनशील प्रस्तुति भी होती है, जिसमें फिल्मकार का दृष्टिकोण अनिवार्य रूप से शामिल रहता है। इस दौरान पत्रकारिता और डॉक्यूमेंट्री के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि जहां पत्रकारिता तात्कालिक सूचना देती है, वहीं डॉक्यूमेंट्री किसी विषय के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पहलुओं को गहराई से प्रस्तुत करती है।
राजेश अमरोही ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री के दर्शक हैं, लेकिन हमें उन तक पहुंचना होगा। आज की परिस्थितियों में कुएं को प्यासे के पास जाना पड़ेगा। वहीं अभय मिश्रा ने कहा कि कैमरा झूठ नहीं बोलता, लेकिन उसके पीछे खड़ा व्यक्ति अपनी दृष्टि के अनुसार सच को प्रस्तुत करता है।
चर्चा में यह भी सामने आया कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को फंडिंग और प्रचार-प्रसार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण उनका दायरा सीमित रह जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि कुछ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के रूप में भी किया जाता है, जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
कार्यक्रम में फिल्म, मीडिया और संस्कृति से जुड़े विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कला प्रेमियों की सक्रिय भागीदारी रही। वहीं, प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान श्रोताओं ने विशेषज्ञों से संवाद कर चर्चा को और समृद्ध बनाया।