डॉ. जोथी ने बताया कि बच्चे का का दायां फेफड़ा (लंग) नहीं था और कोई भी वाहिका दाएं फेफड़े तक नहीं जा रही थी। उसमें सिर्फ बायां फेफड़ा था और बायीं पल्मोनरी आर्टरी आर्योटा से निकल रही थी।
चिकित्सा की भाषा में इसे हेमीट्रंकस कहा जाता है। मरीज के दिल में बड़ा छेद भी था। आमतौर पर ऑक्सीजन की गति 95-100 होता है लेकिन बच्चे की छाती में संक्रमण के चलते गति सिर्फ 35 पर आ गया था।
बच्चे की मां दतिवा बताती हैं कि वे इस बच्चे को लेकर कई अस्पतालों में चक्कर लगा चुकी हैं, लेकिन कहीं भी डॉक्टरों ने जोखिम नहीं लिया। उन्होंने अपने बच्चे के जीने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, आखिरी बार कोशिश करने के लिए यहां पहुंचे।
बॉक्स : ऐसे काम आ गई गाय की वेन
डॉक्टरों ने सबसे पहले दिल का छेद बंद किया। इसके बाद आर्योटा (मुख्य धमनियां) से आ रही बायें फेफड़े की रक्त वाहिका को अलग किया और इस वाहिका एवं दिल के दाएं हिस्से के बीच एक ट्यूब ग्राफ्ट की। ट्यूब को गाय की वेन्स (शिरा) %कॉन्टेग्रा’ से बनाया था। इस वेन (शिरा) में भी वॉल्व होते हैं, जिनका इस्तेमाल हमने दाएं दिल और फेफड़े के बीच में किया। अब %कॉन्टेग्रा’ बाएं फेफड़े तक खून पहुंचा रही है, क्योंकि मरीज में एक ही फेफड़ा था, इसलिए उसे ठीक होने में ज्यादा समय लगा। फिलहाल बच्चा स्वस्थ्य है और शुक्रवार को उसे डिस्चॉर्ज कर दिया है।