इस बार वजह पराली नहीं बल्कि दिल्ली एनसीआर में फूटे पटाखे सांसों की घुटन के लिए जिम्मेदार रहे। पर्यावरणीय संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स के विश्लेषण के अनुसार, पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 77% कमी के बावजूद दिवाली की रात दिल्ली का पीएम 2.5 स्तर 675 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया। यह सामान्य से 212 प्रतिशत अधिक है। दिलचस्प यह कि कथित ग्रीन पटाखे भी हवा को बचाने में नाकाम रहे।
पर्यावरण व जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स की ओर से किए गए विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि वर्ष 2025 की दिवाली दिल्ली-एनसीआर के लिए हाल के वर्षों की सबसे प्रदूषित रातों में से एक रही। रिपोर्ट में कहा गया है, 20 अक्टूबर की रात पीएम 2.5 का स्तर 675 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक जा पहुंचा, जबकि दिवाली से पहले यह केवल 156.6 माइक्रोग्राम था। औसतन, दिवाली के बाद का पीएम 2.5 स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज हुआ जो सामान्य से तीन गुना अधिक था।
प्रमुख शोधकर्ता पलक बल्यान के अनुसार, डेटा बताता है कि इस वर्ष प्रदूषण में तेज वृद्धि पटाखों के धुएं के कारण हुई है। पराली की घटनाएं घटीं, लेकिन दिल्ली में पटाखों का धुआं बेकाबू रहा। दिल्ली सरकार और एनजीटी के सख्त प्रतिबंधों के बावजूद बाजार में कथित ग्रीन पटाखे बड़े पैमाने पर बेचे और जलाए गए, लेकिन क्लाइमेट ट्रेंड्स के अनुसार, इन पटाखों से भी सामान्य पटाखों जितना ही प्रदूषण हुआ। दरअसल, ग्रीन कहे जाने वाले पटाखों में भी धातु और ऑक्सीडाइजर जैसे तत्व मौजूद होते हैं, जो जलने पर नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और भारी धातु जैसे (लेड, बेरियम) का उत्सर्जन करते हैं।
मौसम और हवा की दिशा ने बढ़ाई समस्या : रिपोर्ट में बताया गया कि दिवाली की रात हवा की गति 1 मीटर प्रति सेकंड से भी कम थी। धीमी हवा ने प्रदूषकों को फैलने नहीं दिया, जिससे वे जमीन के पास फंस गए। इस दौरान तापमान में गिरावट (27 से घटकर 19 डिग्री सेल्सियस) और नमी 60 से 90 प्रतिशत तक रही, जिससे इन्वर्जन की स्थिति बनी यानी ठंडी हवा नीचे और गर्म परत ऊपर।
पराली को क्लीनचिट
रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा में इस बार पराली जलाने की घटनाओं में 77% कमी आई है। क्लाइमेट ट्रेंड्स के अनुसार यह गिरावट बाढ़ और फसल चक्र में देरी के कारण हुई। 1 से 12 अक्टूबर के बीच पराली की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं, पर इस साल उस अवधि में भी दिल्ली के पीएम 2.5 स्तर में 15.5% की कमी दर्ज की गई।
ग्रीन पटाखे कम प्रदूषण करते हैं
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीन पटाखे सिर्फ कागजी दावा हैं क्योंकि इनमें प्रदूषण घटाने की तकनीक सीमित है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के एक अध्ययन के अनुसार, ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में औसतन 15 से 20 प्रतिशत कम प्रदूषण तो करते हैं, लेकिन जब लाखों पटाखे एक साथ फूटते हैं तो यह फर्क व्यावहारिक रूप से नगण्य रह जाता है।
ऐसे समझें पांच वर्षों का ट्रेंड : 2021 से 2025 तक के पांच साल के डेटा से पता चलता है कि दिवाली की रात हर वर्ष प्रदूषण दोगुना या तिगुना बढ़ता है। हालांकि कुछ वर्षों में उच्चतम स्तर में हल्की कमी आई, लेकिन त्योहार के अगले दिन तक हवा में जहर घुला रहता है। यह ट्रेंड बताता है कि नीति निर्माण और नियमों के बावजूद सामाजिक अनुशासन की कमी से समस्या जस की तस है।
पटाखों पर संपूर्ण प्रतिबंध नहीं, विकल्पों का विस्तार
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं, साइलेंट पटाखे या लेजर लाइट शो जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित किया जाए, जो उत्सव का रोमांच बनाए रखते हैं पर प्रदूषण नहीं फैलाते। एनसीआर में लगभग 80 लाख वाहन और 40 लाख से अधिक परिवार दिवाली पर पटाखे जलाते हैं। यदि सिर्फ 20% लोग भी स्वेच्छा से पटाखों से परहेज करें तो पीएम2.5 स्तर में लगभग 30% तक कमी लाई जा सकती है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स का सुझाव है कि हवा की गति और तापमान के आधार पर रियल-टाइम फायरवर्क अलर्ट सिस्टम विकसित किया जाए, ताकि जिन रातों में हवा स्थिर हो, उन दिनों पटाखों पर सख्त रोक लगाई जा सके। दिल्ली की हवा जहरीली हुई, लेकिन जिम्मेदारी शहर के भीतर ही रही। दिवाली का अर्थ प्रकाश है, प्रदूषण नहीं और जब तक पटाखों की जगह चेतना का दीप नहीं रोशन होगा तब तक हर दिवाली के बाद की सुबह और आने वाले दो से तीन दिन धुएं में डूबे रहेंगे।