यूपी के बिजनौर निवासी केशव के पिता को दिल की गंभीर बीमारी थी। वह पिता को बचाने के लिए राजधानी के एक नहीं चार अस्पतालों में लेकर गए, मगर किसी भी अस्पताल को उनके पिता पर दया नहीं आया और इलाज के अभाव में केशव के पिता ने दम तोड़ दिया।
स्थिति खराब होने पर उन्हें आईसीयू व वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी, लेकिन उपलब्धता न होने पर अस्पतालों ने भर्ती करने की जगह दूसरे अस्पताल में जाने का सुझाव दिया। परेशान होकर एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया जहां पिता ने दम तोड़ दिया।
दरअसल उत्तर प्रदेश के बिजनौर से केशव के पिता को दिल की बीमारी थी। शुक्रवार को स्थिति गंभीर होने के बाद पहले यूपी के निजी अस्पताल में लेकर गए। वहां से उन्हें एम्स भेजा गया। एम्स की इमरजेंसी में आईसीयू व वेंटिलेटर बेड न होने पर दूसरे अस्पताल में जाने को कहा गया। वहां से सफदरजंग और फिर जीबी पंत के अलावा अन्य अस्पताल में भी आईसीयू व वेंटिलेटर बेड न मिलने पर यूपी के निजी अस्पताल में पिता ने दम तोड़ दिया।
वहीं डॉक्टरों ने की माने तो एम्स में सभी मरीजों को भर्ती करना संभव नहीं है। एम्स में रोजाना 850 से अधिक मरीज आते हैं, जबकि 50 बेड की ही उपलब्धता है। इसके अलावा कुछ लोगों को अन्य सहयोग की मदद से इलाज मिलता है। ऐसे में बड़ी संख्या में मरीजों को बेड के अभाव में रेफर करना पड़ता है। वहीं सफदरजंग अस्पताल प्रशासन का कहना है कि आईसीयू व वेंटिलेटर बेड का अभाव है। अस्पताल में रोजाना काफी संख्या में मरीज आते हैं और सभी को आईसीयू व वेंटिलेटर उपलब्ध करवा पाना संभव नहीं है।
पायलट प्रोजेक्ट भी नहीं भर पाया उड़ान
रेफरल नीति के लिए पायलट प्रोजेक्ट के तहत दो अस्पतालों को जोड़ने की दिशा में भी काम नहीं हो पाया। एम्स ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत द्वारका स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल और एनडीएमसी के चरक पालिका अस्पताल में सुविधा शुरू करने की दिशा में प्रयास किया था। इसके लिए एम्स के डॉक्टरों ने इन अस्पतालों में जाकर इमरजेंसी चिकित्सा की ट्रेनिंग भी दी, लेकिन यह प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में चला गया। इस बारे में इंदिरा गांधी अस्पताल के निदेशक डॉ. ईश्वर सिंह का कहना है कि अभी इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया है। जबकि डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल अपने मरीज का लोड ही संभाल नहीं पा रहा है।
5.7 % मरीजों को मिल पाता है बेड
एम्स ने मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करने के लिए दिल्ली के 20 अस्पतालों के साथ एक साल पहले अक्टूबर में बैठक की थी। एम्स के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास की अध्यक्षता में हुई बैठक को एक साल से अधिक का समय हो गया, लेकिन अभी तक रेफरल नीति नहीं बन पाई है। एम्स के सूत्रों का कहना है कि यह मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते में चला गया है।
कुछ माह पूर्व दिल्ली के अस्पतालों के साथ उचित रेफरल नीति बनाने के लिए उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने एम्स निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास, मुख्य सचिव, एनडीएमसी के चेयरमैन, स्वास्थ्य के प्रधान सचिव, स्वास्थ्य निदेशालय के महानिदेशक, अस्पतालों के चिकित्सा निदेशक के साथ उच्चस्तरीय बैठक की थी। लेकिन इस बैठक का अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। इस बैठक में अधिकारियों ने बताया था कि एम्स की इमरजेंसी में आने वाले केवल 5.7 प्रतिशत मरीज को ही इलाज के लिए बेड मिल पाता है।