संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। उत्तराखंड के हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर पांचवीं अनुसूची लागू करने की मांग तेज होती जा रही है। इसी विषय पर उत्तराखंड एकता मंच की ओर से आयोजित एक प्रशिक्षण सत्र में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई, जिसमें जनजातीय दर्जा बहाल करने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई। सत्र में वक्ताओं ने संवैधानिक प्रावधानों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अपने विचार रखे। मंच के संयोजक अनूप बिष्ट ने कहा कि 1815 के बाद बने कानूनों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में जनजातीय दर्जा लागू करना न केवल संवैधानिक अधिकार है, बल्कि हिमालय के संरक्षण के लिए भी जरूरी है।
कानून विशेषज्ञ आभा थपियाल ने 1874 की जनगणना और ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि पहाड़ के मूल निवासी पारंपरिक रूप से जनजातीय श्रेणी में आते रहे हैं। वक्ताओं ने जोर दिया कि यह मुद्दा केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण से भी जुड़ा है। सहभागी प्रतिभागियों ने इसे जन-आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता बताई।