पुस्तक मेले के पहले दिन प्रभात प्रकाशन के कार्यक्रम में लेखिका वंदना यादव की किताब सैनिक पत्नियों की कथा और व्यथा का विमोचन हुआ। यह किताब सैनिक परिवारों, खासकर सैनिक पत्नियों के संघर्ष, त्याग और जज्बे को सामने लाती है। लेखिका ने कहा, सैनिक बनना मिडिल क्लास का फैसला होता है, जहां देशभक्ति सबसे ऊपर होती है। यह किताब सच्ची कहानियों को उजागर करती है। परिचर्चा में मिलिंद सुधाकर न्यास, कर्नल मलिक, विशाल दुबे मौजूद रहे।
नक्षत्र प्रदर्शनी में ज्योतिष, वैदिक विज्ञान और आस्था एक साथ
भारत मंडपम में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के साथ लगी नक्षत्र प्रदर्शनी भी लोगों के लिए खास आकर्षण बनी है। इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन (आईटीपीओ) और फ्यूचर पॉइंट ने ये आयोजन किया है। शनिवार को सांसद मनोज तिवारी ने इसका उद्घाटन किया। नक्षत्र प्रदर्शनी में ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु, टैरो, हस्तरेखा और तंत्र विद्या के देशभर के विद्वान शामिल हैं।
कुडोपाली की गाथा का 13 भाषाओं में विमोचन
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम, लेकिन महत्वपूर्ण अध्याय को याद किया गया। इस मौके पर ओडिशा के संबलपुर जिले के कुदोपली में हुए ऐतिहासिक विद्रोह पर आधारित पुस्तक द सागा ऑफ कुदोपली-द अनसंग स्टोरी ऑफ 1857 के 13 संस्करणों का लोकार्पण हुआ। यह किताब बांग्ला, पंजाबी, असमिया, मलयालम, उर्दू, मराठी, तमिल, कन्नड़, तेलुगु और स्पेनिश सहित नौ भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुई है। इससे पहले यह हिंदी, अंग्रेजी और ओड़िया में उपलब्ध थी। अब यह कुल 13 भाषाओं में पाठकों तक पहुंचेगी। किताब का लोकार्पण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया।
इस अवसर पर कतर के भारत में राजदूत मोहम्मद हसन जबिर अल जबिर, कतर के संस्कृति मंत्री अब्दुल रहमान बिन हमद बिन जासिम बिन हमद अल थानी, स्पेन के संस्कृति मंत्री अर्नेस्ट उर्तासुन डोमेनेक, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे, शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा सचिव विनीत जोशी, आईटीपीओ के प्रबंध निदेशक नीरज खरवाल, कार्यकारी निदेशक प्रेमजीत लाल और एनबीटी के निदेशक व विश्व पुस्तक मेले के सीईओ युवराज मलिक मौजूद रहे।
शिक्षा मंत्री ने कहा कि ये किताब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अध्याय को सामने लाती है, जिसे इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। ओडिशा के संबलपुर जिले के कुदोपली में वीर सुरेन्द्र साईं और स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह विद्रोह कोई क्षणिक घटना नहीं थी, बल्कि एक लंबा गुरिल्ला आंदोलन था। यह आंदोलन 1827 से 1862 तक चला और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सबसे लंबे सशस्त्र प्रतिरोधों में गिना जाता है। दमन, गिरफ्तारियों और निर्वासन के बावजूद यह संघर्ष पीढ़ियों तक जारी रहा। द सागा ऑफ कुदोपली उन गुमनाम नायकों की कहानी कहती है, जिनका बलिदान समय के साथ भुला दिया गया था। बहुभाषी प्रकाशन से यह कहानी देश और दुनिया तक पहुंचेगी।