राजधानी में पुरुषों के बराबर आ खड़ी हुईं महिलाएं अब किंग मेकर की स्थिति
में हैं। अब महिलाओं के मुद्दों की या उनके हितों की उपेक्षा करना किसी भी
राजनीतिक दल अथवा प्रत्याशी को चुनावी रण से बाहर कर सकता है।
आधी
आबादी होने के बावजूद राजनैतिक दल टिकट देने में भले ही उनकी उपेक्षा करता
हो, लेकिन मतदान के प्रति उनका रुझान साबित करता है कि उनकी मर्जी के बिना
यहां से कोई नेता विधानसभा या संसद नहीं पहुंच सकता।
पिछले चार साल में
महिलाओं के मतदाता प्रतिशत में 15.60 फीसदी का इजाफा हुआ है। जबकि पुरुषों
में महज 12.20 फीसदी की जागरूकता ही बढ़ पायी है।