फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भाजपा और आप की सियासी जंग की कीमत चुका रहे डीयू के प्रोफेसर, अधर में लटकी सैलरी!

Wed, 27 May 2020 06:46 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • दिल्ली यूनिवर्सिटी के वीसी और दिल्ली सरकार के बीच वर्चस्व की लड़ाई में सैकड़ों प्रोफेसरों को नहीं मिल पा रहा मासिक वेतन
  • डूटा की मांग- प्रोफेसर्स के वेतन के मुद्दे को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा जाए, मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल को लिखेंगे पत्र
  • एग्जीक्यूटिव काउंसिल सदस्य ने कहा- 13 मार्च को हुई बैठक का निर्णय हो लागू
विज्ञापन
Delhi University - फोटो : For Refernce Only
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के वीसी योगेश त्यागी के बीच वर्चस्व की जंग से राजधानी के 28 कालेजों के सैकड़ों प्रोफेसर्स और कर्मचारियों को अपने मासिक वेतन के लिए एक बार फिर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

विज्ञापन


प्रोफेसर्स ने गत अप्रैल महीने में भी बकाया वेतन पाने के लिए भूख हड़ताल की थी। इन कॉलेजों में गवर्निंग बॉ़डी बनाए बिना दिल्ली सरकार कॉलेजों को दिये जाने वाले फंड को रोक सकती है, वहीं गवर्निंग बॉडी के लिए दिल्ली सरकार के भेजे नामों में से 6 नामों पर सहमति न बन पाने के कारण इन कालेजों में गवर्निंग बॉडी बनने की राह में फिर अड़चनें आ सकती हैं। 


दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने मांग की है कि सरकार ऐसा मैकेनिज्म बनाए जिससे प्रोफेसर्स को सियासी जंग से बाहर रखा जाए, जिससे उनके और छात्रों के हितों पर कोई आंच न आए।

विज्ञापन


इसके पूर्व दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने डीयू के वीसी योगेश त्यागी पर कॉलेजों में गवर्निंग बॉडी न बनाए जाने को लेकर हमला किया है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय सरकार की तरफ से भेजे गए 6 नामों को न मानकर वीसी ने गवर्निंग बॉडी बनने से रोकने की कोशिश की है।

उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा कर इन कॉलेजों में चल रहे भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की कोशिश की जा रही है।

वीसी पर विश्वविद्यालय में भाजपा का राजनीतिक एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं दिल्ली सरकार पर आरोप है कि वह दिल्ली के कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को रखकर इनका राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है।

कितने प्रकार के कॉलेज

दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत तीन प्रकार की कैटेगरी में 70 से अधिक कॉलेज चलते हैं। पहला, दिल्ली विश्वविद्यालय के वे कॉलेज जो पूरी तरह विश्वविद्यालय संचालित करता है। इनकी पूरी फंडिंग यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) के माध्यम से की जाती है।

दूसरे, वे कॉलेज जिनका मैनेजमेंट ट्रस्ट के जरिए किया जाता है। इनमें 95 फीसद फंडिंग यूजीसी के जरिए और बाकी का पांच फीसदी ट्रस्ट के जरिए किया जाता है। इन दोनों ही प्रकार के कॉलेजों में कोई विवाद नहीं है।

इनमें है विवाद 

तीसरे प्रकार की कैटेगरी में वे 28 कॉलेज आते हैं जो पूरी तरह दिल्ली सरकार के फंड पर निर्भर करते हैं। इनमें हर कॉलेज का मैनेजमेंट एक-एक 15 सदस्यीय गवर्निंग बॉडी के जरिए किया जाता है।

इन कॉलेजों में सभी वित्तीय और नियुक्ति संबंधी अधिकार गवर्निंग बॉडी के पैनल के चेयरमैन और कोषाध्यक्ष के पास होते हैं। इस अधिकार को हथियाने के चक्कर में अक्सर दिल्ली विश्वविद्यालय और दिल्ली सरकार के बीच तनातनी रहती है।

क्योंकि इस गवर्निंग बॉडी के सदस्यों का चयन इन्हीं के माध्यम से किया जाता है। मौजूदा विवाद केवल इन्हीं कॉलेजों को लेकर है।

गवर्निंग बॉडी के सदस्यों का चयन

दिल्ली सरकार के फंड से चलने वाले इन 28 कॉलेजों में सबकी अपनी 15 सदस्यीय गवर्निंग बॉडी होती है। इस बॉडी में कॉलेज के प्रिंसिपल, कॉलेज के दो प्रोफेसर और दिल्ली यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसर शामिल होते हैं।

इन पांच सदस्यों के अलावा पांच सदस्य दिल्ली सरकार नियुक्त करती है। इन सदस्यों की कोई विशेष अर्हता निर्धारित नहीं है, लेकिन माना जाता है कि सरकार ऐसे लोगों को कॉलेज गवर्निंग बॉडी में नियुक्ति की अनुशंसा करेगी, जिनका उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मानक कार्य स्थापित हो चुका हो।

दिल्ली सरकार की तरफ से भेजी गई इस लिस्ट को दिल्ली विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल की सहमति से अंतिम रूप दिया जाता है। इसके अलावा दिल्ली सरकार पांच अन्य सदस्यों का चयन दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ से भेजी गई लिस्ट में से चयन करके करती है।

कहां है विवाद

इस गवर्निंग बॉडी का चेयरमैन और कोषाध्यक्ष कॉलेज के प्रिंसिपल और दो प्रोफेसरों को छोड़ बाकी के 12 सदस्यों में से कोई भी बन सकता है। चेयरमैन के पास कॉलेज में नियुक्ति और खर्च से जुड़े अधिकार होते हैं।

माना जाता है कि इसीलिए इस पद को हथियाने के लिए राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ी जाती है। विश्वविद्यालय के वीसी पर भाजपा समर्थित होने का आरोप लगता है, तो दिल्ली सरकार पर आम आदमी पार्टी के लोगों को इन पदों पर नियुक्त करने की कोशिश करने का आरोप लगता है।

मौजूदा विवाद में दिल्ली सरकार ने लगभग 140 नामों की अनुशंसा 28 कालेजों की गवर्निंग बॉडी के लिए किया था। लेकिन 13 मार्च को हुई एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में छह नामों पर विभिन्न विवाद के कारण स्वीकार नहीं किया गया।

एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने इन नामों की जगह दूसरे नामों को भेजने की सिफारिश की थी, लेकिन दिल्ली सरकार चाहती है कि इन्हीं नामों को दोबारा कालेजों की गवर्निंग बॉडी में जगह दी जाए।

दिल्ली सरकार पर आरोप लगाया जाता है कि वह अपने मनमुताबिक सदस्यों का चयन न होने पर इन कॉलेजों का फंड देरी से जारी करती है, जिससे प्रोफेसरों और अन्य कर्मचारियों का वेतन समय से नहीं मिल पाता है। कई बार इसमें दो-तीन महीने तक की देरी होती है।

डूटा की मांग

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के सचिव आलोक पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि 28 अप्रैल को भी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर्स को अपना वेतन पाने के लिए भूख हड़ताल करनी पड़ी थी। अब मई महीने में एक बार फिर उसी तरह की स्थिति बन रही है।

वे बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अऱविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को पत्र लिखकर वेतन रिलीज किए जाने की मांग करेंगे। मांग न माने जाने पर वे राष्ट्रपति से इस मामले में दखल देने की भी मांग करेंगे।

दयाल सिंह कॉलेज के प्रोफेसर डॉक्टर एके भागी ने कहा कि नियमों में स्पष्ट है कि सरकार केवल ऐसे नामों की ही अनुशंसा करेगी, जिनका ट्रैक रिकॉर्ड शिक्षा के क्षेत्र या किसी सामाजिक क्षेत्र में स्थापित हो चुका है।

केवल छह नामों पर विवाद के कारण रोक लगाई गई थी, इसलिए सरकार को इनकी जगह किसी अच्छे नामों को भेजकर विवाद खत्म करना चाहिए। वे चाहते हैं कि सरकार प्रोफेसर्स के वेतन की प्रक्रिया को किसी भी तरह की राजनीति से अलग रखने की कोशिश की जाए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य राजेश झा ने कहा कि 13 मार्च को हुई बैठक के दौरान सभी मुद्दों पर विचार-विमर्श के बाद कुछ नामों पर पुनर्विचार की बात कही गई थी।

अगर सरकार ने इन नामों को दुबारा वापस भेज दिया है तो प्रशासन को इन्हें स्वीकार कर विवाद खत्म करना चाहिए। इस तरह के लगातार विवाद दिल्ली विश्वविद्यालय और छात्रों के हित में नहीं हैं। प्रशासन को पहल कर इसका समाधान खोजना चाहिए।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के दिल्ली प्रदेश के मीडिया इंचार्ज आशुतोष सिंह ने कहा कि इस तरह के विवाद से छात्रों का हित प्रभावित होता है।

कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी में केवल उन्हीं प्रतिष्ठित लोगों को रखा जाना चाहिए जो कॉलेज परिसर में किसी दल की राजनीति को आगे बढ़ाने की बजाय अकादमिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहयोग कर सकें।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें