दिल्ली में भाजपा के पार्षदों के मेयर और डिप्टी मेयर चुने जाने के साथ ही एक बार फिर से ट्रिपल इंजन की सरकार कायम हो गई है। यानी केंद्र, राज्य और एमसीडी में एक ही पार्टी का कब्जा हो गया है। यह दिल्ली में छठी बार है जब एक ही पार्टी ने तीनों स्तरों की सत्ता अपने हाथ में ली है। यह कारनामा तीन बार दिल्ली में महानगर परिषद के समय हुआ था और अब तीसरी बार विधानसभा के गठन के बाद हुआ है।
दिल्ली में पहली बार ट्रिपल इंजन की सरकार 1972 में बनी थी, जब केंद्र, दिल्ली महानगर परिषद और एमसीडी में कांग्रेस का दबदबा था। यह सत्ता संतुलन 1977 तक चला, लेकिन इमरजेंसी के बाद उपजी जनभावनाओं ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और जनता पार्टी (जिसमें भाजपा का पूर्ववर्ती जनसंघ भी शामिल था) सत्ता में आई।
इस दौरान जनता पार्टी की ट्रिपल इंजन सरकार बनी, लेकिन आंतरिक कलह और नेतृत्व संघर्ष के चलते यह समीकरण तीन साल में ही बिखर गया। मगर वर्ष 1983 में कांग्रेस ने फिर से ट्रिपल इंजन की सरकार बनाई। उस समय महानगर परिषद और एमसीडी के चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और केंद्र में कांग्रेस की सरकार पहले से थी और छह साल तक तीनों जगह उसकी सरकार रही।
चौथी बार 1998 में भाजपा को मौका मिला, जब केंद्र, दिल्ली विधानसभा और एमसीडी पर उसका नियंत्रण था। हालांकि उसकी ट्रिपल इंजन की सरकार मात्र 10 महीने ही चल सकी, क्योंकि 1998 के अंत में विधानसभा चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा था। पांचवीं बार 2004 में कांग्रेस को ट्रिपल इंजन की ताकत मिली, जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए सरकार बनी। उस समय दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार और एमसीडी में भी कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन 2007 के एमसीडी चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और भाजपा ने एमसीडी पर कब्जा कर लिया।
अब 2025 में एक बार फिर भाजपा ने दिल्ली में ट्रिपल इंजन की सरकार बना ली है। केंद्र में मोदी सरकार है और हाल ही में विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर वह सरकार बना चुकी है। इस बीच एमसीडी में आम आदमी पार्टी के 23 पार्षदों के पाला बदलने के बाद भाजपा को बहुमत मिल गया और मेयर व डिप्टी मेयर के चुनाव में उसने जीत हासिल कर ली।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रिपल इंजन की सरकार से नीति निर्माण और क्रियान्वयन में तेजी आ सकती है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब तीनों स्तरों की सरकारें सामंजस्य के साथ काम करें।
मेयर व डिप्टी मेयर चुने जाने के साथ ही एमसीडी में सुधार की राह खुली
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने पार्टी पार्षद राजा इकबाल सिंह के मेयर और जय भगवान यादव के डिप्टी मेयर चुने जाने को एमसीडी में सुशासन और बेहतर नागरिक सेवाओं की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। सचदेवा ने कहा कि अब एमसीडी में प्रशासनिक कार्यों और सेवाओं को सुचारु रूप से चलाने की राह स्पष्ट हो गई है।
भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यह बदलाव दिल्लीवासियों को ट्रिपल इंजन सरकार का लाभ जल्द से जल्द दिलाने की दिशा में एक अहम पहल है। उन्होंने विश्वास जताया कि अब एमसीडी में पारदर्शिता और विकास को प्राथमिकता मिलेगी, जिससे राजधानी के नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।
मेयर राजा इकबाल सिंह का संकल्प, दिल्ली को मिलेगी बेहतर नागरिक सुविधाएं
नवनिर्वाचित मेयर राजा इकबाल सिंह ने पदभार ग्रहण करने के साथ ही अपनी प्राथमिकताओं का एलान किया। उन्होंने राजधानी के नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए स्पष्ट और योजनाबद्ध कार्य योजना की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की सफाई व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी और घरों से कूड़ा उठाने पर वसूलने जाने वाले यूजर चार्ज जैसी आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ डालने वाली व्यवस्था को हटाया जाएगा।
इकबाल ने कहा कि दिल्ली में वर्षों से जटिल समस्याओं में शुमार कूड़े के पहाड़ और जलभराव जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए विशेष रणनीति के साथ कार्य किया जाएगा। उन्होंने कहा कि एमसीडी के अधीन आने वाली सड़कों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास की दिशा में ठोस योजनाएं बनाई जाएंगी।
मेयर ने कहा कि हम स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा की अगुवाई वाली एमसीडी सरकार ट्रिपल इंजन सरकार के तहत केंद्र, राज्य और एमसीडी के समन्वय से जनहित में ठोस कार्य करेगी। वहीं, डिप्टी मेयर के रूप में निर्वाचित जय भगवान यादव ने भरोसा दिलाया कि वे जनहित के हर मुद्दे पर पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ कार्य करेंगे।
एमसीडी सदन में न नेता सदन, न विपक्ष
एमसीडी के सदन की शुक्रवार को हुई बैठक में एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली। सदन में न तो नेता सदन मौजूद थे और न ही नेता विपक्ष। भाजपा ने अपने पार्षद दल के नेता राजा इकबाल सिंह को मेयर पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद उनकी नेता सदन की भूमिका स्वतः समाप्त हो गई। इसी कारण नेता सदन की सीट पर कभी कोई तो कभी कोई भाजपा पार्षद बैठता नजर आया। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के पार्षदों ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया, जिससे विपक्ष की सीट भी खाली रही। इन खाली सीटों पर भी भाजपा पार्षद बैठे दिखे, जो पहले इन्हीं जगहों पर बैठा करते थे।
एमसीडी प्रशासन ने बैठक से पहले बड़ा कदम उठाते हुए नेता सदन और नेता विपक्ष के कक्षों से क्रमश: मुकेश गोयल व राजा इकबाल सिंह की नेम प्लेट हटा दी। अब इन कमरों पर नेताओं के नाम की जगह केवल पदनाम वाली प्लेटें लगाई गई हैं। दिलचस्प बात यह रही कि नेता सदन के कक्ष पर नेता विपक्ष और नेता विपक्ष के कक्ष पर नेता सदन की प्लेट लगा दी गई।
एमसीडी इतिहास में पहली बार हुआ बिना आम चुनाव सत्ता परिवर्तन
एमसीडी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब बिना आम चुनाव के ही सत्ता परिवर्तन हो गया। अब तक हर बार एमसीडी में जिस पार्टी को जनादेश मिला, उसने अपना कार्यकाल पूरा किया, लेकिन आम आदमी पार्टी को यह उपलब्धि नहीं मिल सकी और वह अपने कार्यकाल के चौथे कार्यालय की शुरुआत में ही सत्ता से बाहर हो गई।
आप को वर्ष 2022 में हुए एमसीडी चुनाव में बहुमत मिला था और पार्टी ने एमसीडी की सत्ता में कदम रखा। हाल ही में हुए घटनाक्रम ने एमसीडी की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया। 23 पार्षदों के दल बदलने के चलते उसको भारी झटका लगा।
इसके साथ ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप के प्रदर्शन में आई गिरावट ने एमसीडी में उसके मनोनीत विधायकों की संख्या को भी प्रभावित किया। नतीजतन, सदन में बहुमत खोने के चलते आप अल्पमत में आ गई और उसने मेयर व डिप्टी मेयर चुनाव में अपने पार्षदों को उम्मीदवार नहीं बनाया।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सत्ता परिवर्तन न केवल दिल्ली की स्थानीय राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि इसका असर दो साल बाद एमसीडी चुनाव पर भी पड़ सकता है।