पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एएनएस नाडकर्णी से पूछा, आखिर रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां कैसे चल रही है? आखिर आप इन लोगों को साल-दर-साल संरक्षण क्यों दे रहे हैं। जवाब में नाडकर्णी ने कहा कि लोग रहते हैं तो उन्हें रोजमर्रा की चीजों की आवश्यकता है। चरणबद्ध तरीके से इसका समाधान निकालने की जरूरत है।
कानून को खत्म कर देना समाधान नहीं है। इस पर पीठ ने कहा कि हम ब्रेड, बटर, दूध आदि बेचने वालों के खिलाफ नहीं है। बल्कि हमें आपत्ति बड़े-बड़े कार, साड़ी के शोरूम और रेस्तरां से है। इन्हें हटाया जाना चाहिए। लेकिन आपने अब तक कुछ नहीं किया। जवाब में एएसजी ने कहा कि यह स्थानीय निकाय का काम है। जिस पर पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार यह नहीं कह सकती कि उसके पास पावर नहीं है। आपके पास पावर है लेकिन आप इस्तेमाल नहीं करना चाहते।
बच्चों के फेफड़ों को हो रहा नुकसान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अवैध निर्माण की वजह से ही दिल्ली की जनता प्रदूषण, पार्किंग और हरित क्षेत्रों की समस्या से जूझ रही है। दिल्ली की जनता को परेशानी हो रही है। नागरिकों, विशेषकर बच्चों के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। क्यों? क्योंकि केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, डीडीए, नगर निगम कहते हैं, आपको जो करना है, कीजिए, लेकिन हम कुछ नहीं करेंगे।