डॉ. राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल का 600 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र (फायर एनओसी) नहीं मिलने के कारण अटका हुआ है। इस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जनहित से जुड़ी इस महत्वपूर्ण परियोजना में किसी भी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ सामाजिक न्याय संगठन सोशल ज्यूरिस्ट की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यकाम ने अदालत को बताया कि अस्पताल भवन तैयार होने के बावजूद फायर एनओसी न मिलने से मरीजों को आधुनिक सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
अग्निशमन विभाग ने तीन बार की जांच, हर बार मिली खामी
अग्निशमन विभाग की ओर से अधिवक्ता समीर वशिष्ठ ने अदालत को बताया कि फायर एनओसी के लिए दायर आवेदन पर पहली जांच में 20 बड़ी कमियां मिली थीं, जिसके बाद गत 9 मार्च को आवेदन खारिज कर दिया गया। दूसरी बार 4 जुलाई को निरीक्षण हुआ, लेकिन कोई भी कमी दूर नहीं पाई गई। इसके चलते 22 जुलाई को आवेदन फिर अस्वीकार कर दिया गया।
अदालत के निर्देश पर 1 अगस्त को तीसरी बार निरीक्षण किया गया। विभाग तीन दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट अस्पताल प्रशासन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के मुख्य वास्तुकार को सौंपेगा। हाईकोर्ट ने सीपीडब्ल्यूडी को भी मामले में पक्षकार बनाते हुए निर्देश दिया कि रिपोर्ट मिलते ही शेष कमियों को तत्काल दूर किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि फायर एनओसी के अलावा अस्पताल प्रशासन सभी अन्य आवश्यक अनुमतियां पहले ही प्राप्त कर चुका है।
अदालत ने कहा, मामले को उच्च प्राथमिकता पर रखें
हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से भी मामले में सहायता मांगी है। अदालत ने इस प्रकरण को ''हाई ऑन बोर्ड'' यानी उच्च प्राथमिकता वाले मामलों में रखने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी, जिसमें सीपीडब्ल्यूडी और अस्पताल प्रशासन को अनुपालन एवं प्रगति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। कोर्ट ने दोहराया कि 600 बिस्तरों की यह अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधा जल्द शुरू होना जनहित की आवश्यकता है।
समय पर चालू होता अस्पताल तो हजारों लोगों की बचती जान
यह अत्यंत गंभीर मुद्दा है। प्रतिदिन सैकड़ों गरीब मरीज इलाज के अभाव में जान गंवा देते हैं। यहां 600 बिस्तरों का सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक तैयार है, लेकिन फायर एनओसी न मिलने के चलते उसे संचालन में नहीं लाया जा सका। यदि इसे समय पर चालू कर दिया गया होता, तो हजारों लोगों की जान बच सकती थी। सरकार की निष्क्रियता आम नागरिकों के मौलिक स्वास्थ्य अधिकार का उल्लंघन है। यह सिर्फ कागजी प्रक्रिया की देरी नहीं, बल्कि जान-बूझकर की गई लापरवाही है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को खत्म करती है।
- अशोक अग्रवाल (सोशल ज्यूरिस्ट, याचिकाकर्ता )