दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं ने खास आर्थिक, सामाजिक तथा घनी आबादी को ध्यान में रखते हुए लोगों की लामबंद व हिंसा के लिए उत्तर पूर्वी दिल्ली को चुना था। यह दावा दिल्ली दंगों के सिलसिले में दाखिल आरोप पत्र में दिल्ली पुलिस की ओर से किया गया है।
दिल्ली पुलिस का दावा है कि इस इलाके को इसलिए चुना गया क्योंकि यह दक्षिण पूर्वी दिल्ली के मुकाबले कहीं ज्यादा संवेदनशील है जबकि साजिशकर्ता पॉश कालोनियों के आलीशन घरों में टीवी सैट के सामने सुरक्षित बैठे रहे और दंगों की आंच रोज मेहनत कर रोजी रोटी कमाने वालों पर आई।
दिल्ली पुलिस की ओर से 16 सितंबर को दाखिल आरोपपत्र में कई गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि स्थानीय निवासियों के विरोध के बावजूद उत्तर पूर्वी दिल्ली को लोगों को जमा करने के लिए चुना गया।
धरनों के लिए मुस्लिम बहुल इलाकों को चुनना, दूसरे समुदाय की कालोनियों की ओर जाने वाली सड़कों से उन स्थानों की नजदीकी तथा कोर सदस्यों द्वारा निगरानी रखे जाने से इस बात में कोई शक नहीं है कि इस सब का मकसद अधिकतम मजहबी तनाव, तोड़फोड़ तथा नुकसान करना था, इसकी शुरुआत डिजीटल मीडिया के खास गुट द्वारा पहले इसे हवा दिया जाना था।
पुलिस का कहना है कि साजिशकर्ता इन स्थानों से दूर अपने आलीशन घरों में बैठ कर जनसंचार के माध्यमों का प्रयोग कर रहे थे ताकि उन्हें घटनास्थल पर मौजूद न होने का कानूनी लाभ मिले और उन पर कोई बात भी न आए।
इसके अलावा पुलिस का यह भी अनुमान है कि दिसंबर 2019 हिंसा के हॉटस्पॉट को फरवरी 2020 में दोहराया गया था। इन दोनों स्थानों पर अपराधियों ने पहले भड़काऊ भाषण से लोगों को भड़काना तथा उसके बाद चक्का जाम तथा हिंसा का हथकंडा अपनाया था। जिनकी भूमिका फरवरी 2020 के दंगों में रही, उनमें से ज्यादातर लोग दिसंबर 2019 की हिंसा में भी नजर आए थे।
हालांकि इन दोनों मामलों में यह फर्क था कि दिसंबर 2019 में जामिया तथा शाहीन बाग में भारी हिंसा हुई थी जबकि फरवरी 2020 में इस इलाके को नहीं छुआ गया था। इसके अलावा दिसंबर 2019 की घटनाओं के विरोध के लिए स्थानीय तथा बाहरी महिलाओं तथा बच्चों का प्रयोग फरवरी 2020 में प्रदर्शनों में किया गया। दिसंबर 2019 की हिंसा से साजिशकर्ताओं ने काफी कुछ सीखा था। यह कहा जा सकता है कि फरवरी 2020 के दंगे एक तरह से दिसंबर 2019 की पुनरावृत्ति थे।