दिल्ली के विधायक कामकाज के लिहाज से सेकेंड डिवीजन से पास हुए हैं। बीते चार सालों में विधायकों की विधानसभा में उपस्थिति में कमी आई है। वहीं, आम लोगों से मुलाकात का सिलसिला भी गिरा है। इसके अलावा सदन में जनहित से जुड़े सवालों को उठाने में भी पीछे रहे हैं।
इसका खुलासा प्रजा फाउंडेशन की तरफ से बुधवार को जारी रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में मुख्यमंत्री समेत दिल्ली सरकार के मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष को छोड़कर 60 विधायकों के प्रदर्शन का आकलन किया गया है।
रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के सभी विधायकों का संयुक्त रिपोर्ट कार्ड का औसत स्कोर 2016 में 58.8 फीसदी था। जबकि इस साल यह 53.8 फीसदी रह गया। इस बीच विधानसभा में इनकी उपस्थिति 92.4 फीसदी से गिरकर 80.3 फीसदी हो गई है।
दूसरी तरफ आम लोगों का मानना है कि उनकी विधायकों तक पहुंच कम हुई है। सर्वे रिपोर्ट बताती है कि 2016 में इस तरह की राय देने वालों की संख्या सिर्फ 46 फीसदी थी, जबकि इस साल यह आंकड़ा 51.8 फीसदी पहुंच गया है। इसके अलावा जनहित से जुड़े मसले सदन में उठाने के मामले में विधायकों का औसत स्कोर 49.3 फीसदी है।
प्रजा फाउंडेशन के संस्थापक नितिन देसाई का कहना है कि इस साल चौथी रिपोर्ट जारी की जा रही है। 2016 में इसकी शुरुआत हुई थी। इस बीच विधायकों के प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है। दिल्लीवालों की बेहतरी के लिए पार्टी नेतृत्व को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए।
महेंद्र गोयल अव्वल तो नरेश बाल्यान फिसड्डी
रिपोर्ट में विधायकों को उनके काम के आधार पर रैंकिंग दी गई है। रिठाला से आप विधायक महेंद्र गोयल 73.83 फीसदी स्कोर के साथ अव्वल रहे हैं। रिपोर्ट में इनका मिस्टर पॉपुलर का खिताब दिया गया है। जबकि दूसरे व तीसरे नंबर पर भाजपा विधायक जगदीश प्रधान व आप विधायक एसके बग्गा हैं।
दूसरी तरफ सबसे खराब प्रदर्शन उत्तर नगर से आप विधायक नरेश बाल्यान का है। 33.31 फीसदी अंक के साथ वे 60वें स्थान पर हैं। इसके अलावा मदन लाल व अमानतुल्लाह खान नीचे से दूसरे व तीसरे पायदान पर रहे।
रिपोर्ट कार्ड तैयार करने का आधार
श्रम मंत्रालय के पूर्व सलाहकार एमसी वर्मा का कहना है कि रिपोर्ट कार्ड तैयार करते समय विधायकों की सदन में मौजूदगी, जनहित से जुड़े सवालों पर चर्चा, कानून पारित करवाने में उसकी सहभागिता, लोगों से मुलाकात करने में उनकी दिलचस्पी, शिक्षा, विधायक निधि का इस्तेमाल आदि से जुड़े आंकड़ों पर जोर दिया गया है। इसके लिए विधानसभा, दिल्ली सरकार, चुनाव आयोग व दिल्ली पुलिस से आरटीआई व ऑनलाइन मौजूद आंकड़ों का सहारा लिया गया है।