घर-घर जाकर दरवाजे खटखटाकर जगाने की रिवायतें हुई खत्म
अब रात भर शोरगुल और रंग-बिरंगी रोशनी में गुजरता है रमजान
फिरदौस आलम
नई दिल्ली। चांदनी चौक की तंग गलियों से लेकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों तक, मुगलिया दिल्ली की फिजाओं में रमजान का एक अलग ही नूर नजर आता है। हालांकि, वक्त के साथ इस ऐतिहासिक शहर की रिवायतें भी बदल गईं हैं। रमजान में सहरी के लिए रोजेदारों को जगाने की पुरानी परंपरा लुप्त हो गई है। जिस शाहजहानाबाद में कभी रोजेदार सहरी के लिए ढोल की थाप से जागते थे, उसकी जगह अब अलार्म ने ले लिया है। वक्त के साथ घर-घर जाकर दरवाजे खटखटाकर जगाने की रिवायतें खत्म हो गईं हैं।
पुरानी दिल्ली के निवासी बताते हैं कि अकीदतमंदों ने अब अपने पड़ोसियों की फिक्र करना भी कम कर दिया है। वे परिवार तक सिमट कर रह गए हैं। उनका कहना है कि 1960 के दशक में रमजान में चांदनी चौक, मटिया महल, मीना बाजार, उर्दू बाजार और जामा मस्जिद के आसपास वाले बाजारों में सन्नाटा और रूहानियत हुआ करती थी। अकीदतमंद ईशा की नमाज और तरावीह की नमाज के बाद सो जाया करते थे। उन्हें जगाने के लिए ढोल-बाजे के साथ बुजुर्ग, नौजवानों और बच्चों की टोलियां घर-घर दस्तक देती थी। लेकिन, अब यहां के बाजारों में रात भर चहल-पहल और रोशनी का पहरा रहता है।
मोहब्बत और सवाब की रहती थी नीयत
पुरानी दिल्ली निवासी मो. आजम बताते हैं कि उस दौर में जगाने वालों की एक खास अहमियत होती थी। उनका मकसद शोर करना नहीं, बल्कि हर रोजेदार को इबादत के लिए वक्त पर जगाना होता था। यह काम वे मोहब्बत और सवाब की नीयत से करते थे। वे तब तक घर का दरवाजा खटखटाते रहते थे, जब तक अंदर से आवाज नहीं आती थी। दरवाजा खोलने तक टोली घर के बाहर खड़ी रहती थी। यह अंदाज था इतिहास के पन्नों से लुप्त हो गया है।
-
बातचीत:
10-12 लोगों का एक समूह पहले ढोल-बाजे के साथ गलियों से गुजरते थे। वह रोजेदारों को सहरी करने के लिए आवाज लगाते थे। सहरी का उत्सव जैसा लगता था।
- नासिर अली
कुछ लोगों का समूह ढोल-बाजे के साथ गलियों से गुजरता था, तो उनमें से कुछ लोग घर-घर जाकर रोजेदारों को जगाने का काम करते थे। आवाज आने तक वे दरवाजे पर खड़े रहते थे।
- मो. फैसल