लॉकडाउन की अनदेखी के बढ़ते सिलसिले को देखते हुए रविवार सुबह से ही डीटीसी की बसें डिपो वापस भेज दी गईं। कुछ बसें अगर सड़कों पर दिखीं भी तो आईडी कार्ड देखने के बाद ही जरूरी ड्यूटी पर तैनात कर्मियों को प्रवेश करने दिया गया। कुछ घंटे के लिए शनिवार को मिली राहत के बाद बसें भीड़ न बढ़े इसे देखते हुए बसों में आम यात्रियों को प्रवेश नहीं करने दिया गया। इस दौरान सड़क पर बसों की संख्या काफी कम रही।
एनसीआर के शहरों से यूपी जाने के लिए सैकड़ों कामगार अपने घरों से निकल पड़े। लेकिन बसें न मिलने की वजह से उन्हें कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। रास्ते में भी पुलिस कर्मियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की तरफ से पैदल चलने वालों को खाना खिलाया गया ताकि कोई भूखा न रहे।
सुबह करीब 11 बजे द्वारका सहित कुछ अन्य डिपो से बाहर निकलने वाली बसों को रास्ते में ही ट्रैफिक पुलिस कर्मियों ने खाली करवाने के बाद वापस डिपो भेज दिया। द्वारका सेक्टर-एक से पालम के बीच करीब 11 किलोमीटर के दायरे में डीटीसी और क्लस्टर की पांच-छह बसें दिखीं, जिनमें अधिकतर सीटें इसलिए खाली थी क्योंकि महत्वपूर्ण ड्यूटी में तैनात कर्मियों के अलावा किसी यात्री को इसमें सवार नहीं होने दिया गया।
लॉकडाउन के बाद डीटीसी की संचालित होने वाली बसों में केवल आईडी कार्ड दिखाने पर ही जरूरी ड्यूटी पर तैनात अस्पताल, पुलिस और जल बोर्ड सहित जरूरी महकमे के कर्मियों को ही बस में यात्रा करने दिया जा रहा था।
लॉकडाउन तक कहीं न जाने की ठानी
गुरुग्राम की फैक्ट्री में काम करने वाले तीन दोस्त प्रदीप, अनिल और मोहित ने बताया कि उन्हें उत्तर प्रदेश के बहराईच के लिए जाना था। लेकिन कश्मीरी गेट से ही बसों को डिपो के लिए भेज दिए जाने की वजह से उन्हें 40 से अधिक किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। धौला कुंआ से दोबारा कापसहेड़ा के लिए लौटते हुए तीनों दोस्तों ने कहा कि अभी भी 15 किलोमीटर के करीब पैदल चलना है। लेकिन अब लॉकडाउन खत्म होने से पहले कहीं न जाने की ठान ली है।