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Delhi: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- बेरोजगार पत्नी निरुपयोगी नहीं, उसकी मेहनत की अनदेखी करना अन्यायपूर्ण

Tue, 24 Feb 2026 06:37 AM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बेरोजगार पत्नी का श्रम कमाने वाले पति को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है। भरण-पोषण के दावों का निर्णय करते समय पत्नी के इस योगदान को अनदेखा करना अवास्तविक और अन्यायपूर्ण होगा।
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demo - फोटो : ANI
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विस्तार
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बेरोजगार पत्नी की धारणा को दूर करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी कभी बेकार नहीं बैठती है। उसका श्रम कमाने वाले पति को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है। भरण-पोषण के दावों का निर्णय करते समय पत्नी के इस योगदान को अनदेखा करना अवास्तविक और अन्यायपूर्ण होगा।

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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी के बेरोजगार होने को आलस्य या जानबूझकर निर्भरता के बराबर नहीं माना जा सकता है। भरण-पोषण का निर्धारण करते समय, कानून को न केवल वित्तीय आय को बल्कि विवाह के दौरान घर और घरेलू संबंधों में उसके योगदान के आर्थिक मूल्य को भी मान्यता देनी चाहिए। अदालत ने 16 फरवरी के अपने फैसले में आगे कहा, यह धारणा कि न कमाने वाली जीवनसाथी आलसी है, उसके घरेलू योगदान को लेकर गलतफहमी को दर्शाती है।  रोजगार न होने को आलस्य कहना आसान है, लेकिन घर चलाने में लगने वाले श्रम को पहचानना कहीं अधिक कठिन है।

पति ने पत्नी को आलसी बताया था : पति ने हाईकोर्ट में दावा किया कि पत्नी आलसी बैठी भरण-पोषण मांग रही है, जबकि वह बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है। कोर्ट ने कहा कि कमाई की क्षमता और वास्तविक कमाई अलग-अलग हैं। जो महिलाएं काम कर सकती हैं और काम करने को इच्छुक हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन केवल इस आधार पर भरण-पोषण से इन्कार करना कि वह कमाने में सक्षम है और उसे अपने पति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
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घरेलू हिंसा मामले में आया फैसला
हाईकोर्ट ने कहा, इसलिए, यह अदालत किसी भी ऐसे दृष्टिकोण से सहमत नहीं है जो पत्नी के बेरोजगार होने को निष्क्रियता या पति पर जानबूझकर निर्भरता के बराबर मानता हो। अदालत घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण देने के मामले पर विचार कर रही थी। ट्रॉयल कोर्ट और अपील अदालत ने महिला को भरण-पोषण देने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि वह शिक्षित और सक्षम थी लेकिन नौकरी नहीं कर रही थी। महिला की शादी 2012 में हुई थी और आरोप है कि पति ने 2020 में उसे और उनके नाबालिग बेटे को छोड़ दिया था।

50 हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण का आदेश
अदालत ने आगे कहा कि भारतीय समाज में आज भी महिलाओं से शादी के बाद नौकरी छोड़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वैवाहिक विवादों में पति अक्सर इसके विपरीत रुख अपनाते हुए अपनी योग्य पत्नियों को भरण-पोषण देने से इन्कार कर देते हैं और उन पर जानबूझकर बेरोजगार रहने का आरोप लगाते हैं। कोर्ट ने माना कि माना कि शादी या परिवार के कारण करियर छोड़ने वाली महिला बाद में उसी स्तर पर नौकरी नहीं पा सकती। मामले में पत्नी की कोई कमाई साबित नहीं हुई, इसलिए कोर्ट ने उसे 50,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया।

पत्नी का रोजगार अवैतनिक...
कोर्ट ने कहा, घर संभालना, बच्चों की देखभाल, परिवार का सहयोग और नौकरी में पति के तबादले के अनुसार जीवन ढालना भी काम है, भले ही यह अवैतनिक हो। अदालत ने कहा, ये जिम्मेदारियां बैंक स्टेटमेंट में दिखाई नहीं देतीं और न ही इनसे कर योग्य आय उत्पन्न होती है, फिर भी ये एक अदृश्य संरचना का निर्माण करती हैं जिस पर कई परिवार चलते हैं।

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