दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें विश्वविद्यालयों को कोरोना महामारी के कारण सिर्फ ट्यूशन फीस लेने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि रियायत अधिकार का मामला नहीं है। लिहाजा इस संबंध में कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे को प्रतिवेदन के तौर पर देखें और कानून व सरकारी नीति के तहत इसका समाधान निकालें। पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालयों को अपने प्रोफेसरों को भुगतान करना है और ऑनलाइन कक्षाओं के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण भी करना है। इसलिए उन्हें रियायतें देने के लिए नहीं कहा जा सकता। पीठ ने जनहित याचिका में छात्रों को गैजेट और 4जी इंटरनेट पैक प्रदान करने जैसी कई राहतों से असहमति जताई।
यह याचिका कानून के चौथे वर्ष के छात्र की ओर से दायर की गई थी। याचिका पर वकील कुश शर्मा से पीठ ने कहा कि आप स्वर्ग और आकाश मांग सकते हैं, लेकिन जरूरत की चीजें नहीं मांग सकते। आखिर मांगने में क्या हर्ज है। पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिका जुर्माने के साथ खारिज करने लायक है, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं।
याची की मांग थी कि अभिभावकों को शुल्क जमा करने के लिए अधिक समय दिया जाए। ऐसे छात्रों को गैजेट और तेज गति वाला इंटरनेट कनेक्शन प्रदान करें जो इसका खर्च नहीं उठा सकते। याची का आरोप था कि फीस न भरने पर बच्चों का नाम काटने की धमकी कुछ संस्थान दे रहे हैं।