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शाहरुख-गौरी की बढ़ीं मुश्किलें: समीर वानखेड़े की याचिका पर नोटिस, नेटफ्लिक्स से भी मांगा जवाब: मांगे दो करोड़

Wed, 08 Oct 2025 06:14 PM IST
अनुज कुमार अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े की याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने शाहरुख खान की कंपनी को नोटिस जारी किया है। याचिका में  बास्टर्ड्स ऑफ बॉलीवुड वेब सीरीज से कुछ सीन को हटाने की मांग की है।
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शाहरुख खान, आर्यन खान और समीर वानखेड़े - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े के मानहानि मामले में शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज समेत नेटफ्लिक्स को समन जारी किया। वानखेड़े ने शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान के निर्देशन वाली नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज 'द बास्टर्ड्स ऑफ बॉलीवुड' में उनकी छवि को कथित रूप से अपमानजनक ढंग से चित्रित करने वाली सामग्री को हटाने और इस पर रोक लगाने की मांग की है।

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हालांकि, न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने इस मामले में कोई अंतरिम निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) आदेश पारित नहीं किया। कोर्ट ने कहा, उन्हें निर्देश लेने और जवाब दाखिल करने दें। सामान्य रूप से निषेधाज्ञा आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

इस मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को होगी। वानखेड़े 2021 में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के जोनल डायरेक्टर थे, ने मुंबई में एक ड्रग रेड के दौरान बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था।

वानखेड़े ने वेब सीरीज के निर्माता रेड चिलीज एंटरटेनमेंट (जो शाहरुख खान और उनकी पत्नी गौरी खान के स्वामित्व में है), नेटफ्लिक्स, एक्स कॉर्प, गूगल, मेटा और एक मीडिया आउटलेट आरपीजी लाइफस्टाइल मीडिया प्रा. लि. के खिलाफ 2 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की है।

वानखेड़े के मुताबिक, वेब सीरीज में एक ऐसा दृश्य है जिसमें उनके समान दिखने वाले एक व्यक्ति को दिखाया गया है, जो उन्हें लक्षित और उपहास करता है। उन्होंने इस सामग्री को हटाने और आगे ऐसी अपमानजनक सामग्री को बनाने, प्रकाशित करने या प्रसारित करने से रोकने की मांग की है। इसके अलावा, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर संबंधित सामग्री बनाने वाले अज्ञात व्यक्तियों (जॉन डो) के खिलाफ भी निषेधाज्ञा की मांग की है।
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उनका कहना है कि यह सीरीज न केवल उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि नशीली दवाओं के खिलाफ प्रवर्तन एजेंसियों की गलत और नकारात्मक छवि प्रस्तुत करती है, जिससे कानून प्रवर्तन संस्थानों में जनता का विश्वास कम होता है।

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