दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले 11 माह से लोकायुक्त पद को रिक्त पड़े होने के मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने उपराज्यपाल को लोकायुक्त पद को भरने के लिए जल्द से जल्द प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि हालांकि लोकायुक्त पद को मंत्रिपरिषद की सहायता व सलाह से भरा जाता है लेकिन वर्तमान में दिल्ली में कोई सरकार न होने से न ही मंत्रिपरिषद है न ही प्रतिपक्ष। ऐसे में उपराज्यपाल बिना किसी की सलाह व सहायता के लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए अधिकृत हैं।
मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी व न्यायमूर्ति आरएस एंडलॉ की खंडपीठ ने लोकायुक्त की नियुक्ति मुद्दे में दायर याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि लोकायुक्त का पद वैधानिक प्रावधानों के तहत अनिवार्य है और उनके पद को बिना किसी देरी के भरा जाना चाहिए। अदालत ने कहा हम उपराज्यपाल से आग्रह करते हैं कि वे बिना किसी देरी से इस पद को भरने को सुनिश्चित करने की प्रक्रिया शुरू करें।
खंडपीठ ने कहा कि लोकायुक्त किसी भी राज्य के लोगों के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार व कुशासन के खिलाफ वे अपनी शिकायते दे सकते हैं। लोकायुक्त का पद रिक्त होने से समाज परेशान होता है और हमारा मानना है कि ऐसे मामलों की जांच करने के लिए एक प्रभावी मंच होना चाहिए।
अदालत ने कहा दिल्ली विधानसभा व उसके सदस्यों की वर्तमान स्थिति के परिदृश्य में लोकायुक्त के पद की अहमियत और बढ़ जाती है। खंडपीठ ने विधायकों द्वारा वेतन व अन्य सुविधाएं लेने के मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान में दिल्ली विधानसभा में नागरिकों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि हैं और वे भत्तों व कार्यालय के लाभ का आनंद ले रहे हैं।
वे स्थानीय क्षेत्र विकास योजना का भी लाभ उठा रहे हैं, लेकिन लोकायुक्त के रिक्त पद के कारण उनके द्वारा किए गए गलत कामों की जांच नहीं हो पा रही।
खंडपीठ ने उपराज्यपाल को कहा कि वे लोकायुक्त के पद को जल्द से जल्द व अधिकतम छह माह में भरने की प्रक्रिया शुरू करें। अदालत ने कहा कि इस आदेश का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।