देवेंद्र सहरावत और अनिल वाजपेयी
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हाईकोर्ट ने आम आदमी पार्टी (आप) के दो बागी विधायकों अनिल वाजपेयी व देवेंद्र सेहरावत की याचिकाएं सुनवाई के बाद खारिज कर दीं। इन विधायकों ने सिंगल जज के आठ जुलाई के फैसले को चुनौती दी थी। सिंगल जज ने इन विधायकों की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उनके खिलाफ दी गई शिकायत पर सुनवाई से विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल को अलग करने और सुनवाई के लिए कमेटी बनाने की मांग की गई थी। इन विधायकों पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए अयोग्य ठहराने की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की खंडपीठ ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि इन पर आदेश देने का कोई आधार नहीं है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष का अधिकार है कि वह विधायकों की आपत्तियों व उन्हें अयोग्य ठहराए जाने संबंधी शिकायत पर एक साथ सुनवाई कर सकते हैं। इसके लिए कोई तय फार्मूला नहीं बनाया जा सकता।
याचिका पर जिरह करते हुए विधायकों के वकीलों ने कहा कि सिंगल जज ने विधानसभा अध्यक्ष को सुनवाई से अलग करने के पीछे उनके तर्क व शिकायतों को नहीं सुनने के तथ्य पर विचार नहीं किया। सिंगल जज ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने शिकायतों पर जो तरीका अपनाया है वह गलत नहीं है। विधायकों के उस तर्क को भी खारिज कर दिया गया था कि उनकी आपत्ति पर इसलिए विचार नहीं किया गया क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष का आचरण पक्षपात पूर्ण है।
आप के इन विधायकों के खिलाफ पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज ने दस जून को विधानसभा अध्यक्ष को शिकायत देकर इन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। इन विधायकों पर कथित तौर पर भाजपा में शामिल होने का आरोप है। इस शिकायत पर अध्यक्ष ने 17 जून को नोटिस जारी कर इन विधायकों से आठ जुलाई तक जवाब मांगा था। इससे पहले ही इन विधायकों ने याचिका दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दे दी थी।
विधायकों का कहना था कि विधानसभा अध्यक्ष का कोई राजनीतिक रुझान नहीं होना चाहिए लेकिन वे आप के चुनाव प्रचार व प्रदर्शन में शामिल हुए थे। इतना ही वे आप उम्मीदवार आतिशी मर्लिना के चुनाव प्रचार में नजर आए थे। ऐसे में उनसे शिकायतों पर निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती।
दूसरी ओर विधानसभा अध्यक्ष व सौरभ भारद्वाज के वकीलों का कहना था कि विधायकों की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है क्योंकि सेहरावत ने यह तथ्य छिपाया है कि उनकी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सुनने से इनकार कर दिया था। इसके बाद सेहरावत ने याचिका वापस ले ली थी।