जिस बच्चे की नौकरी लग जाती है उन्हें अच्छा और जिसे नौकरी नहीं मिल पाती, उन्हे बुरा या खराब छात्र कह दिया जाता है। उन्होंने कहा कि यह सोच बदलनी चाहिए। अब छात्रों को नौकरी पाने वाले की नहीं, नौकरी देने वाले उद्योगपति बनने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि पंद्रह साल तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी बच्चों में आत्मविश्वास का संचार नहीं हो पाता। अपने करियर को लेकर बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी चिंतित रहते हैं।
पूरे शैक्षिक जीवन में उनके अच्छे-बुरे होने का पैमाना कक्षा में उनके अंकों के प्रदर्शन से तोला जाता है। उन्होंने कहा कि अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था हमारे छात्रों में इतना भी आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पाती है तो हमें उसके बारे में पुनर्विचार करना चाहिए। इसके पहले भी मनीष सिसोदिया हैप्पीनेस करीकुलम लागू कर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच चुके हैं।