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केजरीवाल ने बिहार पुलिस से मांगी मदद

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क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि दिल्ली सरकार ने बिहार सरकार से कुछ पुलिस अधिकारियों की मांग की है ताकि दिल्ली में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाने के काम में तेजी ला सकें।
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असल में दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस बारे में बिहार के सीएम नितीश कुमार से कुछ पुलिसवालों को डेपुटेशन पर दिल्ली भेजने की मांग की थी जिसे बिहार सरकार ने स्वीकार कर लिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक बिहार काडर के छह पुलिस अधिकारियों को इस काम के लिए मुक्त किया गया है। इनमें एसपी स्तर के एक अधिकारी के साथ पांच इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी शामिल हैं।
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हालांकि दिल्ली सरकार की इस मांग के साथ ही दिल्ली सरकार और राजनिवास के बीच विवाद फिर से बढ़ने की संभावना बढ़ गई है। इस खबर के सामने आते ही राजनिवास ने साफ किया है कि दिल्ली का एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) एलजी के अधिकारक्षेत्र और उसके नियंत्रण में आता है।

राजनिवास और सरकार के बीच फिर बढ़ा विवाद

इस बीच राजनिवास ने अपनी ओर से सफाई देते हुए स्पष्ट किया है कि एलजी को अधिकारियों के डेपुटेशन के बारे में अभी तक कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। ऐसा प्रस्ताव मिलने के बाद इसकी जांच की जाएगी।

जबकि दिल्ली सरकार का कहना है कि एसीबी के ‌अधिकार क्षेत्र के बारे में दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही स्पष्टीकरण दे चुका है इसलिए, इस पर अब कोई विवाद नहीं रह गया है।

साथ ही दिल्ली सरकार ने देश के सभी इमानदार अधिकारियों से दिल्ली के एसीबी को मजबूत बनाने के लिए मदद की मांग भी की है।

दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली सरकार और एसीबी को देश के किसी भी हिस्से से अपने लिए अधिकारियों को नियु‌क्त करने का पूरा अधिकार है।
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'केंद्र सरकार ने बना दिया है मजाक'

राजनिवास की ओर से आए बयान पर हमला बोलते हुए डिप्टी सीएम का कहना है केंद्र सरकार ने हर चीज को मजाक बना दिया है। कभी वह एलजी साहब से कहलवाते हैं कि सभी अधिकारी उनके अंडर में आएंगे और कभी कहते हैं कि एसीबी भी उनके अंडर में आएगी।

बता दें कि गृहमंत्रालय ने 21 जून को जो नोटिफिकेशन जारी किया था उसमें कहा गया था कि दिल्ली सरकार का एंटी करप्‍शन ब्यूरो केंद्र सरकार के कर्मचारियों या अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच नहीं कर सकता।

हालांकि इस नोटिफिकेशन पर गहराए विवाद के बाद मामला कोर्ट में चला गया। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं सुनाया है।
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