हादसे में 475 बच्चियों की तबीयत बिगड़ी थी।
तुगलकाबाद स्थित कंटेनर डिपो में रसायन के रिसाव से भले ही कोई बड़ा हादसा न हुआ हो लेकिन भविष्य में भी बड़ा हादसा नहीं होगा इसकी गारंटी नहीं ली जा सकती। लिहाजा इस कंटेनर डिपो को मौजूदा जगह से बाहरी दिल्ली अथवा ऐसे जगह पर शिफ्ट किया जाना चाहिए जहां आबादी कम हो।
मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से बनाई गई कमेटी का मानना है कि जितना जल्दी संभव हो यार्ड को इस जगह से शिफ्ट करना चाहिए। उधर, गैस की चपेट में आकर अस्पताल पहुंची बच्चियों को रविवार को छुट्टी दे दी गई है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फॉर्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख और जांच समिति के प्रमुख डॉ. वाईके गुप्ता ने बताया कि यह संयोग था कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ क्योंकि जिस जगह पर यार्ड है बड़ा हादसा भी हो सकता है। कंटेनर यार्ड घनी आबादी के बीच स्थित है, इस तरह का यार्ड ऐसे जगह पर बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि समिति का सुझाव देगी कि इस यार्ड को फौरन यहां से घनी आबादी से हटाकर किसी दूर-दराज के इलाके में शिफ्ट किया जाए जहां आबादी कम हो। जिस समय इस जगह पर यार्ड बना था, उस समय यहां की आबादी बेहद कम थी।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि जिस रसायन के रिसाव से बच्चों को दिक्कत हुई उसका नाम टू क्लोरो मिथाइल पाइरीडीन (पाउडर के फॉर्म में होता है) था, यह इतना खतरनाक नहीं होता है, इसका इस्तेमाल आमतौर पर दवा तैयार करने में, कीड़े को मारने के लिए बनने वाली और फर्टिलाइजर में इस्तेमाल होता है। उनका यह भी कहना था कि यदि इसे कोई खा ले या सीधे इसके संपर्क में आ जाए तब दिक्कत हो सकती है। हालांकि इस यार्ड में किस-किस तरह के रसायन आते हैं इसकी पड़ताल उनकी टीम ने नहीं की है।