लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल आम आदमी पार्टी के दो विधायकों अनिल वाजपेयी और देवेंद्र सहरावत की सदस्यता खतरे में पड़ने से अब उन्होंने पासा पलटना शुरू कर दिया। भले ही भाजपा ने उनको शामिल कर चुनावी माहौल बदलने का प्रयास किया लेकिन अब पार्टी की किरकिरी तय है। वहीं इससे आप को भाजपा पर आक्रामक होने का एक बार फिर मौका मिलेगा। इस प्रकरण के बाद भाजपा के उस दावे की भी पोल खुल गई कि उनके संपर्क में आप के 18 विधायक है। इतना ही नहीं विधायक आम आदमी पार्टी को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन पद का मोह नहीं त्याग पा रहे। इसमेें कोई संदेह नहीं है कि आप के काफी विधायक पार्टी से नाराज चल रहे है लेकिन 4-5 को छोड़कर कोई भी खुलकर सामने नहीं आ रहे।
लोकसभा चुनाव से पहले गांधी नगर से विधायक अनिल वाजपेयी और बिजवासन से देवेंद्र सहरावत ने भाजपा में शामिल होने की घोषणा की थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय गोयल और प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने उनका स्वागत करते हुए दावा किया था कि 12 से ज्यादा विधायक पार्टी के संपर्क में हैं। इनके कोई अन्य विधायक भाजपा में शामिल नहीं हुआ, लेकिन इनकी सदस्यता पर आप ने सवाल उठा दिया तो दोनों ने पासा पलटना शुरू कर दिया।
सहरावत ने बयान जारी कर दिया कि उन्होंने पर्ची कटवाकर भाजपा की सदस्यता नहीं ली, यानी वे अब भी स्वयं को आप का विधायक होने का दावा कर रहे हैं। कानून के जानकार अधिवक्ता सुनील और कृष्ण नोटियाल का मानना है कि यदि इन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली तो वे आप के ही सदस्य माने जाएंगे। फिर भी दोनों विधानसभा अध्यक्ष को क्या जवाब देते हैं उस पर पूरा निर्णय निर्भर है। भाजपा कार्यालय जाकर शामिल होने और आडियो-वीडियो का कोई असर नहीं पड़ेगा। हां दोनों विधायक जरूर कह सकते हैं कि वे गए थे लेकिन बाद में मन बदल गया और सदस्यता नहीं ली। इससे उनकी सदस्यता नहीं जाएगी।
हो सकती है भाजपा की किरकिरी
जानकारों का मानना है कि पूरे प्रकरण से भाजपा की किरकिरी तय है। कुछ भाजपा नेताओं का भी मानना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इन विधायकों को भाजपा में शामिल कर जल्दबाजी की है। यदि करना ही था तो सदस्यता जरूर दिलवाते। इस प्रकरण से यह संदेह जाएगा कि भाजपा ने पूरा ड्रामा मात्र लोकसभा चुनाव जीतने के लिए माहौल बनाने के लिए किया था। ऐसे नेताओं का यह भी मानना है कि आप से नाराज विधायक कपिल मिश्रा भी पार्टी में रह कर भाजपा के लिए काम कर ही रहे हैं। मिश्रा ने मोदी सरकार पांच साल का अभियान भी चलाया था। ऐसे में इन विधायकों को पार्टी में शामिल करने से क्या लाभ हुआ, किरकरी होगी अलग। इससे आप को आक्रामक होने का भी मौका मिलेगा। दरअसल पूरा खेल पद का मोह और मिलने वाली सुविधाओं का है। यदि विधायकों की सदस्यता जाती है तो वे इन सभी सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे।