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ये नेता ‘दल-दल’ में विचरते हैं...!

Sat, 11 Oct 2014 08:24 AM IST
ओम प्रकाश/अमर उजाला, फरीदाबाद
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कभी इस दल, कभी उस दल, ये ‘दल-दल’ में विचरते हैं/ मलाई पाने की खातिर, ये कुछ भी कर गुजरते हैं...।। कवि दिनेश रघुवंशी ने दलबदलू नेताओं पर यह लाइनें लिखी हैं। वह कहते हैं कि विचारधारा वाली पार्टी के नेता भी फिसल गए। जो कल तक थे कहते संभलना-संभलना वही लड़खड़ाए सवेरे-सवेरे।
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जी हां! आयाराम-गयाराम का नारा हरियाणावी धरती की उपज है। पलवल जिले की हसनपुर सीट से निर्दलीय चुनाव जीते गयालाल ने एक दिन में चार बार पार्टी बदली। यह बात 1967 की है। तब से शेख फरीद की धरती पर यह फार्मूला हिट हो रहा है।

इस सूत्र से दलबदलू नेता विधानसभा पहुंचते रहे, लेकिन इससे राजनीति की नई पौध नहीं उभरी। नए नेता पांच साल तक तैयारी करते रहे और दूसरे दलों के नेता आकर टिकट ले गए। कुल मिलाकर यह धरती इस फार्मूले को हमेशा चरितार्थ करती रही है। इस बार भी विधानसभा चुनाव इस रोग से अछूता नहीं है।
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बदरपुर बॉर्डर से लेकर होडल तक के नेताओं ने पलटी मारने का काम किया है। कई बार इन नेताओं के दलों और उनकी आस्था को देखकर राजनीतिक हास्य भी पैदा होता है। जो कल तक दुश्मन थे वे आज दोस्त हैं। जो दोस्त थे, वह दुश्मन।

लोगों को नेकी, विश्वास और ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वाले नेताजी पल-पल रंग बदलते हैं। न आस्था और न विश्वास, सिर्फ दिखती है कुर्सी। इस बार पलवल, होडल, हथीन, फरीदाबाद शहरी, तिगांव और बड़खल में दलबदलू नेता मैदान में हैं। देखना है कि क्या इस बार भी इनका दांव लगेगा।

किन लोगों ने मारी पलटी
-राजेश नागर (भाजपा): तिगांव विधानसभा का यह प्रत्याशी टिकट मिलने से ठीक पहले तक कांग्रेसी था। जुगाड़ लगा, टिकट मिला और भगवा कपड़े पहन लिए।

-प्रवेश मेहता (इनेलो): फरीदाबाद शहरी विधानसभा का यह प्रत्याशी अपने आपको भाजपा का कट्टर समर्थक बताता था। 2009 में चुनाव भी लड़ा। लेकिन 2014 में टिकट नहीं मिला तो चश्मा पहन लिया।

-चंदर भाटिया (इनेलो): इनके पिता कुंदनलाल भाटिया ने इस शहर में भाजपा का खाता खोला था। यह कट्टर भाजपाई थे। पिछली बार टिकट नहीं मिला तो हजकां में आ गए थे। फिर भाजपा में आए। लेकिन इस बार भी दाल नहीं गली तो चश्मा पहन लिया।

-एसी चौधरी: इन्हें किसी भी दल का टिकट हाथ नहीं लगा। कभी अपने आपको इंदिरा और राजीव गांधी के खास बताने वाले यह महोदय कांग्रेस से तीन बार विधायक बने। तीनों बार मंत्री भी रहे। इस बार उन्हें बड़खल से टिकट नहीं मिला तो वे इनेलो में चले गए। इस समय राजनीतिक ‘विभीषण’ बनकर कांग्रेस के लिए परेशानी खड़ी कर रखी है।

-सुभाष कत्याल (बसपा): वर्ष 1978 में जनता पार्टी से जुड़े। वर्ष 1982 में निर्दलीय, 1987 में लोकदल, इनेलो, इस साल भाजपा में आए। टिकट नहीं मिला तो बसपा में शामिल हो गए। एक माह में तीन बार बदली पार्टी।

-करण सिंह दलाल (कांग्रेस): वर्ष 1985 में कांग्रेस में आए, 1991 में विधायक बने। 1996 में हरियाणा विकास पार्टी में शामिल होकर दोबारा विधायक बने। वर्ष 2000 में टिकट नहीं मिला तो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ  इंडिया में पहुंचे, विधायक बने। वर्ष 2005 में कांग्रेस में आए और विधायक बने।

-हर्ष कुमार (भाजपा): वर्ष 1987 में निर्दलीय विधायक बने। 1996 में हरियाणा विकास पार्टी से लड़े और जीते। 2005 में निर्दलीय। 2009 में कांग्रेस। इस बार टिकट के लिए भाजपा में आए।
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-रामरतन (भाजपा): वर्ष 1991 में कांग्रेस से विधायक बने। वर्ष 2000 में इनेलो का दामन थामा। इस बार भाजपा में आए।
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