बची हुई मछलियों को लोगों ने जाल बिछाकर पकड़ा, कुछ को पक्षियों ने खाया
फिरदौस आलम
पूर्वी दिल्ली। संजय झील में मरी हुई मछलियों को प्रशासन ने गड्ढा खोदकर दफना दिया गया है। बाकी बची हुई मछलियों को शुक्रवार को स्थानीय लोग और मछुआरे पकड़ते हुए नजर आए। कुछ मछलियां ऐसी थीं, जो प्रशासन की नजर से बच गईं, उसे झील के आसपास रहने वाले पक्षियों ने खाया। अभी भी कुछ मछलियां बची हुई हैं, जो झील के किनारे बंजर भूमि पर खाद बनने का इंतजार कर रही हैं। ताकि इस वीरान और प्यासी झील को फिर से हरी भरी की जा सके। इस झील को डीडीए की ओर से 1982 में विकसित किया गया। मकसद साफ था, झील को विकसित करना और एक पर्यटक स्थल बनाना। लेकिन प्रशासन की लापरवाही और नाकामी ने 182 एकड़ (12 एक झील और 170 एकड़ वन क्षेत्र) में फैली इस झील की खाल तक नोच डाली। आलम यह है कि झील की मिट्टी में अब दरारें पड़ चुकी हैं, मिट्टी के पोपले बन कर बाहर उभर पड़े हैं। इसकी सुंदरता, इनके जलीय जीव मर रहे हैं, जिनके सदमे में यह खुद भी अब प्यासी मरने का इंतजार कर रही है।
स्थानीय लोगों ने बताया कि यह झील वर्षों ने बंजर पड़ी हुई है। कुछ हिस्से में पानी हैं, लेकिन वह भी गंदा है। हर साल प्रचंड गर्मी में अक्सर मछलियां दम दोड़ देती हैं। लेकिन इस बार सैकड़ों की तादाद में मछलियां मर गई, जो उन्हें अचंभित कर गई। झील की रखवाली करने वाले गार्ड ने बताया कि झील में पानी की कमी है, जिसकी वजह से यह झील सूख गई है। आरोप लगाया कि वह प्रशासन को इत्तिला करके खुद थक चुके हैं। खुद को छोटा आदमी बताते हुए कहा कि साहब हम तो गार्ड है, क्या ही कर सकते हैं। ऊपर बैठे बड़े बाबू से पूछो।
झील की पुल टूटी, जान जोखिम में डाल रहे लोग : संजय झील को पार करने के लिए यहां एक पुल का निर्माण भी किया गया है। यह पुल जर्जर हो चुकी है। झील में टहलने वाले लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पुल को पार करे हैं। ऐसे में कभी भी किसी बड़े हादसे को दावत दे सकता है।
जहरीले पानी में नहा रहे बच्चे : झील के कुछ हिस्सों में जो पानी बचा हुआ है, वह पानी गंदा और जहरीला हो चुका है। इसमें बच्चे चिलचिलाती धूप में नहाते हुए नजर आए। उस दौरान बच्चे झील में तैर रहीं मछलियों को बाहर निकालते हुए दिखे। इसके अलावा झील के आसपास गंदगी और प्लास्टिक की सामग्रियां भी बिखरी हुई दिखाई दीं।