राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बृहस्पतिवार केजरीवाल सरकार को ‘मुफ्त सीवर योजना’ की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि यह नीति नागरिक जीवन के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
एनजीटी अध्यक्ष न्यायाधीश एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यमुना में अनुपचारित सीवेज और प्रदूषकों के छोड़ने से रोकने के लिए दिल्ली सरकार का दृष्टिकोण पर्यावरण की चिंता और कानून के खिलाफ है। पीठ ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और यमुना नदी के कायाकल्प के लिए सीवेज और कीचड़ प्रबंधन और अन्य प्रदूषण पहलुओं को सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देशों के सख्त अनुपालन की आवश्यकता है।
पिछले 25 सालों से अधिक समय में सुप्रीम कोर्ट और इस अधिकरण के बार-बार दिए गए निर्देशों की अनुपालना करने में अधिकारी लगातार असफल रहे हैं। पीठ ने कहा कि यमुना नदी के क्षरण की क्षति का मूल्यांकन, मौद्रिक दृष्टि से, ऐसी विफलताओं के कारण जवाबदेही तय करने के लिए भी आवश्यक हो गया है।
इसके लिए पीठ ने एक संयुक्त समिति बनाने के निर्देश दिए हैं। इसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा, नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, आईआईटी रुड़की और आईआईटी दिल्ली को शामिल किया गया है। यह समिति दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश प्रशासन के काम न करने के चलते पर्यावरण को हुए क्षरण, मौद्रिक दृष्टि से यमुना को हुए नुकसान का आंकलन कर तीन महीने में रिपोर्ट देगी।