प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिव्यांगों को बेहतर अवसर मुहैया कराने को लेकर प्रतिबद्ध हैं लेकिन डीडीए ने दिल्ली ट्रांस्को से प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए एक अधिकारी को इसी आधार पर नियुक्त करने से इनकार कर दिया है। इस बारे में डीडीए ने दिल्ली ट्रांसको को औपचारिक पत्र भी भेज दिया है।
दरअसल, दिल्ली ट्रांसको में जनसंपर्क निदेशक डॉ. ऋषिराज भाटी को प्रतिनियुक्ति पर डीडीए में भेजा गया था। पिछले 26 साल से अलग-अलग पदों पर सेवा दे रहे भाटी उस वक्त हैरान हो गए जब उनके दिव्यांग होने की बात कहते हुए डीडीए ने उन्हें ज्वाइन करने से मना कर दिया।
दिल्ली ट्रांस्को को भेजे पत्र में डीडीए ने लिखा है कि निदेशक जनसंपर्क को फील्ड में काम करना पड़ता है। ऐसे में डीडीए की दिलचस्पी भाटी को इस पद पर नियुक्त करने की नहीं है।
टी ने कहा कि उनसे भेदभाव किया जा रहा है। वहीं, डीडीए के एक अधिकारी ने कहा कि भाटी का यह गलत आरोप है। हमलोग किसी के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं करते हैं।
'नौकरी के लिए योग्य न होने के कारण वापस भेज'
dda
- फोटो : अमर उजाला
भाटी को उनकी शारीरिक स्थिति की वजह से नहीं बल्कि नौकरी के लिए जो योग्यता और उपयुक्तता होनी चाहिए उसमें कमी होने के कारण वापस भेज दिया गया। अगर कोई नौकरी के लिए तय मानक व जरूरतों के मुताबिक फिट नहीं है और उसे वापस भेज दिया जाता है तो इसका यह मतलब नहीं है कि उससे भेदभाव किया जा रहा है।
उधर, ‘मैं दिल्ली ट्रांसको लौट आया हूं’ नाम से ऋषिराज ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की है। इसमें भाटी ने लिखा है कि पिछले करीब 26 साल से वह पूरी क्षमता से अलग-अलग जगहों पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं लेकिन पहली बार दिव्यांग होने के आधार पर उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा है।
दिल्ली ट्रांसको में समान पद पर पिछले 16 साल से काम किया है। उनका कहना है कि पिछले दो साल की एसीआर में उनके प्रदर्शन को बहुत अच्छा बताया गया है। बावजूद इसके डीडीए के वाइस चेयरमैन ने अपंगता को आधार बनाकर उन्हें वापस ट्रांसको लौटा दिया।
भाटी ने लिखा है कि उन्हें अपनी क्षमता साबित करने के लिए डीडीए वीसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। भाटी का कहना है कि विभिन्न विषयों में उनके पास नौ डिग्रियां हैं फिर भी उन्हें वापस भेज दिया गया।
ग्रेटर नोएडा से दिल्ली खुद कार चला कर जाते हैं ऋषिराज
dda
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. ऋषिराज भाटी आईटीओ स्थित दिल्ली ट्रांसको लिमिटेड कार्यालय अपने निवास ग्रेटर नोएडा से खुद कार चला कर जाते हैं। दोनों तरफ की दूरी करीब 80 किलोमीटर है।
डॉ. भाटी का कहना है कि गौतमबुद्ध नगर के कोंडली बांगर स्थित उनके पैतृक गांव में कोई स्कूल नहीं था तब उनके पिता ने गांव में स्कूल की नींव रखी थी। ताकि उनका दिव्यांग बेटा पढ़ाई कर पाए। नौंवी से 12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने दनकौर में की।
तीन वर्ष तक वह स्कूल हाथ वाली ट्राई साइकिल चला कर जाते थे और यह दूरी करीब 20 किलोमीटर की थी। डॉ. भाटी ने कहा, यह सिर्फ मेरी लड़ाई नहीं है बल्कि दिव्यांगों की लड़ाई है। जरूरत पड़ी तो इसके लिए कानून का भी सहारा लेने से पीछे नहीं हटूंगा।
ट्रांसको में काम के दौरान मैं अक्सर फील्ड में जाता हूं लेकिन कभी किसी तरह की दिक्कत विभाग को नहीं हुई और न ही शिकायत हुई। हालांकि राजभवन ने इस संबंध में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है।