विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान एसीई 2 रिसेप्टर ने फेफड़ों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। एसीई 2 रिसेप्टर कई प्रकार की कोशिकाओं की सतह पर मौजूद एक प्रोटीन है। यह एसएआरएस-सीओवी-2 वायरस के लिए रिसेप्टर के रूप में कार्य करता है। इसने कोशिकाओं को संक्रमित किया। इस संक्रमण को रोकने में मकोय-हरित मंजरी में मिला रसायन फायदेमंद रहा।
एम्स में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फार्माकोलॉजी सम्मेलन और भारतीय फार्माकोलॉजी सोसाइटी के 54वें वार्षिक सम्मेलन में दिल्ली फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रमेश के गोयल ने कहा कि अरावली के रिज क्षेत्र में मकोय और हरित मंजरी दो पौधे मिले। इनका इस्तेमाल इलाज के लिए किया गया। मकोय की दवा पहले से हमदर्द में उपलब्ध थी। इसी को कोविड के मरीजों को देना शुरू किया। दवा से मरीजों में सुधार दिखा। उन्होंने कहा कि बाद में चित्रा विश्वविद्यालय बेंगलुरु में 140 मरीजों पर इस दवा का ट्रायल किया गया। ट्रायल के बाद कोरोपिल जिंक नाम की दवा तैयार हुई जिसे आयुष ने लंबी जांच के बाद मंजूरी दे दी है।
अन्य रोगों में भी है फायदेमंद
कुलपति का कहना है कि पौधे में मिलने वाला यह रसायन दूसरे रोगों में भी फायदेमंद हो सकता है। उम्मीद की जा रही है कि गंभीर रूप से प्रभावित हुए फेफड़ों के अलावा स्ट्रोक, शरीर में लकवा, पार्किंसंस, लीवर फाइब्रोसिस, यूट्रस का बढ़ना सहित दूसरे रोगों में भी फायदेमंद होगा। इसे लेकर बड़े स्तर पर शोध किया जा रहा है। शोध के बाद पता चलेगा कि पौधे में मिलने वाला रसायन किन-किन रोगों में मदद कर सकता है।