अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक यौन प्रताड़ना के मामले को इस आधार पर रेप के अन्य मामलों से अलग नहीं रखा जा सकता कि आरोपी पीड़िता का पति है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों को रेप के अन्य केसों की तरह ही निपटाया जाएगा। अदालत ने यह टिप्पणी आरोपी का जमानत आवेदन रद्द करते हुए की।
रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लाऊ ने कहा कि विधायिका को वैवाहिक यौन शोषण व दुर्व्यवहार के मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। इस प्रकार के मामलों में महिलाएं अक्सर चुप रहती हैं। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वो ऐसे अपराध से पीड़ित महिलाओं को सहायता प्रदान करे।
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इस मामले में केशवपुरम निवासी महिला ने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसके पति ने गर्भावस्था के दौरान उससे अप्राकृतिक कृत्य किया। सुनवाई के दौरान महिला ने अदालत से आग्रह किया कि वह पति पर निर्भर है। उसकी जमानत स्वीकार की जाए। अदालत ने आवेदन खारिज करते हुए कहा कि महिला ससुराल में रह रही है।
ऐसे में स्पष्ट है कि वह ससुराल वालों के प्रभाव में है। अदालत ने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि इस प्रकार के मामलों में दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज करने पर विचार क्यों नहीं किया गया। अदालत ने फैसले की प्रति पुलिस आयुक्त को भेजने का निर्देश देते हुए संयुक्त पुलिस आयुक्त को मामले को स्वयं देखने का भी आदेश दिया है।