दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीपीसी) में व्याप्त भ्रष्टाचार के मामले में अदालत ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाए हैं। एक लाख कनेडियन डॉलर की धोखाधड़ी के मामले में पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से इंकार करते हुए अदालत ने कहा कि यह मामला सिर्फ धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि आम लोगों के न्यायपालिका पर विश्वास और धार्मिक भावनाओं से भी जुड़ा है। इसलिए जांच जरूरी है। अदालत ने फैसले की प्रति पुलिस आयुक्त को भेजते हुए उन्हें जांच पर निगरानी रखने को कहा है।
पटियाला हाउस अदालत की मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट प्रीति परेजा ने फैसले में कहा कि पुलिस ने कई अहम मुद्दों पर जांच नहीं की और न ही संबंधित दस्तावेज जब्त किए। जांच एजेंसी ने मामले में गवाह बनने के लिए आवेदन करने वाले कमेटी कर्मचारी के मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान तक नहीं करवाए और धारा 161 में बयान दर्ज कर क्लोजर रिपोर्ट दायर कर दी। उन्होंने कहा कि पुलिस व अदालत की जिम्मेदारी है कि निष्पक्ष जांच करें, ताकि आम लोगों का विश्वास आपराधिक न्याय व्यवस्था पर बना रहे। इस मामले में जांच एजेंसी ने सही तरीके से काम नहीं किया। पुलिस ने जल्दबाजी में क्लोजर रिपोर्ट दायर की है। यह सिस्टम आम लोगों के विश्वास को कुचलता है।
अदालत ने कहा कि यह मामला सामान्य नहीं है, बल्कि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा होने के साथ-साथ सार्वजनिक धन से भी जुड़ा है। पुलिस ने प्राथमिकी भी सही धाराओं में दर्ज नहीं की। पुलिस ने मामला मात्र धारा 420 में दर्ज किया है, जबकि स्वयं एसीपी ने माना कि धारा 409 भी बनती है। ऐसे में स्पष्ट है कि आगे जांच जरूरी है। अदालत ने जांच एजेंसी को हर 15 दिन में जांच प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि इस पर संयुक्त आयुक्त के हस्ताक्षर होने जरूरी हैं।
वहीं, अदालत ने मामले की जांच अपराध शाखा को सौंपने संबंधी याची गुरमीत सिंह शंटी के आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि उसे इस प्रकार का आदेश देने का अधिकार नहीं है। ऐसे में आवेदन विचार योग्य नहीं है। अदालत ने उनके प्राथमिकी में उचित धाराएं लगाने का निर्देश देने व धारा 409 जोड़ने के संबंध में दायर आवेदन को भी खारिज कर दिया। आरोप है कि एक श्रद्धालु ने एक लाख कनाडा डालर का चेक कमेटी को दान में दिया था, लेकिन तत्कालीन प्रधान मनजीत सिंह जीके व उनके साथियों ने हेराफेरी कर उक्त राशि का गबन कर लिया।