फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Coronoavirus: लॉकडाउन में दूध को तरस रही है 'नागरिकता', पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों के भुखमरी के हालात

Fri, 03 Apr 2020 07:34 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  •  पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों के कैम्प में मुश्किल हालत में जिंदगी गुजार रहे लोग 
  • 135 परिवारों के 800 लोग राशन की मदद पर निर्भर
विज्ञापन
Hindu refugees Baby Nagrikta with Mother Aarti - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पिछले साल दिसंबर 2019 में जब लोकसभा में नागरिकता बिल पास हुआ था, पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी इस बिल से काफी खुश थे। उसी दौरान भारत में सात साल से शरण लेकर रह रहे एक हिंदू शरणार्थी की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया था और बेटी का नाम नागरिकता रखा था। उस दौरान कई संस्थाओं ने मदद करने का एलान किया था।   

विज्ञापन




वहीं ‘नागरिकता’ को भी लॉकडाउन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उसके लिए दूध का इंतजाम नहीं हो पा रहा है क्योंकि उसके पिता ईश्वरलाल और मां आरती के पास बस्ती के अन्य लोगों की तरह इस समय कोई काम नहीं है।

दिल्ली पुलिस और राजधानी की अनेक सामाजिक संस्थाएं इस पाकिस्तानी-हिन्दू शरणार्थी बस्ती में भी खाना और राशन के सामान बांट रही हैं। शरणार्थी कैंप के परिवारों को इन सामानों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।
विज्ञापन


नागरिकता की मां आरती ने अमर उजाला को बताया कि लॉकडाउन के कारण उन लोगों के पास कोई काम नहीं है। सामान्य दिनों में वे सड़क के किनारे रेहड़ी-पटरी पर कुछ सामान बेचकर या कहीं मजदूरी कर कुछ पैसे कमा लेते थे, जिससे उनकी जिन्दगी आसानी से गुजर जाती थी।

लेकिन कोरोना ने उनकी जिंदगी मुश्किल कर दी है। बस्ती के ज्यादातर परिवारों के सामने भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई है।

दिल्ली सरकार से नहीं मिली मदद

नागरिकता की दादी मीरादास और उनके दादा दयालदास ने कहा कि उन्हें दिल्ली पुलिस ने दो-तीन किलो गेंहू का आटा, एक किलो दाल और तेल मुहैया कराया था, लेकिन परिवार के छह लोगों के लिए यह एक दिन का ही राशन होता है।

ऐसे में उनकी मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। इस समय वे लोग आसपास के लोगों से उधार ले लेकर अपना काम चला रहे हैं। मजनू का टीला इलाके में पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी कैंप के मुखिया के तौर पर दयाल दास ने बताया कि उन्होंने यह सुना है कि दिल्ली सरकार गरीब परिवारों को प्रति व्यक्ति 7.5 किलो राशन उपलब्ध करवा रही है, लेकिन अभी तक उन लोगों के पास ऐसी कोई मदद नहीं पहुंची है।

कैंप में लगभग 135 परिवार रहते हैं, जिनमें कुल मिलाकर लगभग 800 सदस्य हैं। 
 
एक अन्य शरणार्थी नरेश का कहना है कि ने बताया कि दिल्ली पुलिस और कुछ अन्य लोग तैयार चावल-दाल उनकी बस्ती तक पहुंचा रहे हैं। कुछ लोग कभी-कभी खाने का पैकेट भी पहुंचाते हैं। इससे पेट की आग तो बुझ जाती है लेकिन अन्य जरूरतों के लिए उन्हें बेहद मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है।

उनकी झुग्गियों से साबुन-तेल जैसी चीजें पूरी तरह खत्म हो गई हैं, और अब वे इसके बिना रहने को मजबूर हैं। अब वे ईश्वर से केवल लॉकडाउन खत्म होने की प्रार्थना कर रहे हैं जिससे उनकी जिंदगी दुबारा पटरी पर लौट सके।

खुद को किया अलग-थलग

पाकिस्तानी शरणार्थी कैंप के लोग कोरोना संक्रमण के खतरे से वाकिफ हैं और खुद को कोरोना से बचाने की कोशिश भी कर रहे हैं।  कैंप का ज्यादातर रास्ता सड़क से लगा हुआ है और खुला है।

इसके बाद भी लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए बस्ती को झाड़ और पेड़ों की टूटी डालियों से ‘सील’ कर दिया है। बस्ती में अभी तक किसी के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की जानकारी नहीं मिली है। 

यहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता हुआ नहीं दिखाई पड़ा। काम न होने की स्थिति में लोग पास बैठकर बातें करते हुए अपना समय बिताते हुए दिखाई पड़े।
विज्ञापन

इस तरह सुर्खियों में आई थी नागरिकता

अब तक बेहद विवादित रहे नागरिकता संशोधन अधिनियम को संसद से 11 दिसंबर 2019 को मंजूरी मिल गई थी। इसके दो दिन पहले नागरिकता का जन्म सिविल लाइन्स के अरुणा आसफ अली अस्पताल में हो चुका था।

कानून में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से 2014 के पहले भारत आ चुके हिन्दुओं, सिखों, जैनों और ईसाईयों को भारतीय नागरिकता देने की बात कही गई थी। नागरिकता की मां आरती, पिता ईश्वरलाल, दादी मीरादास और दादा दयालदास कई अन्य परिवारों के साथ वर्ष 2013 में ही भारत आ चुके थे और ये लोग भारतीय नागरिकता की मांग कर रहे थे।

इस कानून के पास होने से इनको भी भारतीय  नागरिकता मिलने का रास्ता साफ हो गया था, इसी खुशी में परिवार ने अपनी बेटी का नाम नागरिकता रखा था।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें