रूमेटिक हार्ट डिजीज से जूझ रहे मरीजों के लिए थोड़ी राहत भरी खबर है। डिगॉक्सिन दवा के सेवन से मरीजों में हार्ट फेल होने के खतरे को कम किया जा सकता है। इस संबंध में एम्स दिल्ली सहित देशभर के 12 अस्पतालों में क्लीनिकल ट्रायल किए गए। ट्रायल के दौरान मरीजों को दो तरह की दवा दी गई। इसमें डिगॉक्सिन दवा लेने वाले मरीजों में हार्ट फेल के बढ़ते खतरे का प्रभाव कम देखने को मिला।
एम्स दिल्ली के कार्डियोलॉजी एंड कार्डियोथोरेसिक साइंसेज सेंटर के डॉ. गणेश कार्तिकेयन की इस अध्ययन में अहम भूमिका रही। यह अध्ययन जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के मई 2026 के अंक में प्रकाशित हुआ है। मरीजों पर 25 फरवरी 2022 से 31 अगस्त 2024 के बीच अध्ययन किया गया। मरीजों की निगरानी 15 दिसंबर 2025 तक की गई। इसमें औसतन 2.1 वर्ष का फॉलोअप भी शामिल रहा।
मरीजों में 72 फीसदी महिलाएं, 90 प्रतिशत की स्थिति गंभीर थी
अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत उम्र 46 वर्ष थी। इनमें करीब 72 फीसदी महिलाएं थीं। इनमें से 81.5 फीसदी मरीजों के हार्ट के कई वॉल्व प्रभावित थे। इसमें 85 फीसदी मरीजों में मिट्रल स्टेनोसिस (वॉल्व का गंभीर सिकुड़ना), 70 फीसदी में एट्रियल फिब्रिलेशन (दिल की अनियमित धड़कन) और 90 फीसदी की स्थिति गंभीर थी।
डिगॉक्सिन लेने वालों में हार्ट फेल होने का खतरा 31.40%
अध्ययन के लिए 1769 मरीजों को पंजीकृत किया गया था। हालांकि 1759 मरीज ही अध्ययन का हिस्सा बन सके। इन मरीजों को दो अलग-अलग समूह में बांटा गया। इनमें 885 मरीजों को रोजाना 0.125 से 0.25 मिलीग्राम डिगॉक्सिन दवा दी गई। दूसरे समूह के 884 मरीजों को प्लेसिबो दिया। इसमें डिगॉक्सिन लेने वाले मरीजों में मौत या नए/बढ़ते हार्ट फेल का संयुक्त खतरा 31.4 फीसदी और प्लेसिबो समूह वाले में यह खतरा 35.5 फीसदी रहा। अधिकतर मामलों में मरीजों का इलाज अस्पताल में भर्ती किए बिना दवाओं की मात्रा बढ़ाकर किया गया।
इन सवालों को समझें तो अध्ययन की अहमियत समझने में आसानी होगी
रूमेटिक हार्ट डिजीज है क्या?
रूमेटिक हार्ट डिजीज को समझने के लिए हमें रूमेटिक फीवर यानी गठिया बुखार को समझना होगा। बचपन में गले में होने वाले संक्रमण की वजह से गठिया बुखार होता है। इसका समय पर इलाज नहीं होने पर हृदय के वॉल्व को स्थायी रूप से नुकसान पहुंच सकता है। रूमेटिक हार्ट डिजीज के मरीज को सांस फूलने और थकान जैसे लक्षणों से जूझना पड़ता है।
इसे हमें जानना जरूरी क्यों?
बच्चों के गले के संक्रमण को नजरअंदाज नहीं करेंगे। इससे बड़ी समस्या से बचाव हो सकेगा।
डिगॉक्सिन और प्लेसिबो के बारे में हम क्यों जानें?
डिगॉक्सिन समूह की दवाओं का इस्तेमाल हृदय की विफलता और अनियमित हृदय गति की शिकायत वाले मरीजों के इलाज में होता है। इससे रक्त परिसंचरण में सुधार होता है। वहीं प्लेसिबो को आसान शब्दों में कहें कि यह चीनी की गोली या ऐसे तत्व होते हैं जिनमें कोई औषधीय गुण तो न हो पर मरीज को एहसास हो जाए कि उसे असली दवा दी जा रही है। यह मरीज पर मनोवैज्ञानिक असर छोड़ती है।
यह रहा परिणाम
नए और बिगड़ते हार्ट फेल के मामले डिगॉक्सिन समूह में 25.8 फीसदी और प्लेसिबो समूह में 29.2 फीसदी दर्ज किए गए। हालांकि मौत के मामलों में बड़ा अंतर नहीं दिखा। डिगॉक्सिन समूह के 88 मरीजों और प्लेसिबो समूह के 91 मरीजों की मौत हुई। वहीं दवा विषाक्तता की आशंका के कारण दस मरीजों की डिगॉक्सिन और एक मरीज की प्लेसिबो बंद करनी पड़ी।