न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने याचिकाकर्ता परदीप कुमार जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस मामले में फैसला सुनाया है। प्रवीण कुमार दिल्ली के पहाड़गंज में एक भोजनालय के मालिक हैं जो नान एवं अन्य खाद्य पदार्थ बेचते हैं।
जैन ने अपनी याचिका में दावा किया था कि 'चूर-चूर नान' भाव पर उनका खास अधिकार है क्योंकि उन्होंने इसका पंजीकरण कराया हुआ है। दरअसल एक अन्य भोजनालय ने इस भाव का इस्तेमाल किया था जिसका जैन ने याचिका में विरोध करते हुए इसे ट्रेडमार्क का उल्लंघन बताया था।
अदालत ने कहा कि अगर पंजीकरण गलत तरीके से दिए गए हैं या इस तरह के सामान्य भाव के लिए आवेदन किए गए हैं तो इसे अनदेखा नहीं कर सकते हैं। इन शब्दों का इस्तेमाल सामान्य बोलचाल में होता है और इस पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता।