मिट्टी के दीये का चलन खत्म होने से तंगी और बदहाली के साये तले जीवन यापन कर रहे कुहार अपना पुशतैनी व्यवसाय छोड़ने पर मजबूर हो गये।
दीपावली पर दूसरों के घरो को जगमगाने तथा सुख समृद्धि की देवी लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति बनाने वाले कुहार पुशतैनी व्यवसाय के बदले अब ये रोजी रोटी के लिए अन्यत्र रोजगार तलाशने में जुटै हैं।
लोग अब सिर्फ परपरा निने के लिए ही मिटटी के दिये जला रहे है। जिसके चलते इन कुहारों के दियों की खपत कम होने से इनकी आमदनी कम हो गई है और कुहार आर्थिक बदहाली की मार झेल रहे हैं।
छारौड़ा गांव के रहने वाले 55 वर्षीय कुम्हार (प्रजापत) प्रसा व कृष्ण ने बताया कि पहले उन्हें शादी व त्यौहारों के मौके पर मिटटी के बर्तन जैसे कुल्लड ,दिया, कलश, सुरई, गुललक, चील्लम, कोशा, गगरी व जमली आदि बनाने के लिए इतना ऑडर मिल जाता था कि परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम आसानी से कर लेते थे।
अब बाजार में चाइनिज व प्लास्टिक आदि सामानों के आ जाने से उनका धंधा चौपट हो गया है। अब लोग मिटटी के बर्तनों की जगह प्लास्टिक आइटमों का प्रयोग करना अधिक पसंद करते है।
बिजली के सजावटी बल्ब, मोमबत्ती एवं रेडीमेट दीपक के बाजार में आ जाने से उनका कारोबार चौपट हो गया है। बता दे कि मेवात के अधिकतर गांवों में इस पेशे से हजारों परिवार जुड़े थे।
लेकिन लाभ की सम्भावना कम होने व लागत ज्यादा होने से अब यह रोजगार सीमित हो गया है। मेवात क्षेत्र के अधिकतर कुहार चाइनिज आइटम आने व रोजगार न चलने के कारण अपने पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़कर किन्ही दुसरे कार्यो में मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं।
कस्बे में रहने वाले खूबी राम ने बताया कि परिवार का पालन पोषन करने के अभाव में कुम्हार रोज मर-मर कर अपने पुश्तैनी व्यवसाय को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। शासन प्रशासन उनके सिमटते राजेगार की तरफ बिल्कुल गंभीर नहीं है। जिसके चलते उनका पुशतेनी धंधा अपने वजूद को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है।