दिल्ली की सड़कों पर कूड़ा बीनता, गालियां सुनता, बोतलें जमा करने वाला
बचपन अपने मन की बात कह रहा है। देश भर के कई शहरों से आए बेघर बच्चे
दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली जिंदगी में कहीं खो से जाते हैं। इनका बचपन कहीं
बोतलें बीनते, होटलों पर काम करते और दिल्ली के लोगों की गालियां सुनते बीत
जाता है।
कभी छोटू चाय की दुकान पर काम करता दिखता है तो कभी अखबार
बेचता। क्या आप यकीन करेंगे कि दिल्ली की सड़कों पर अखबार बेचने वाले बेघर
अब खुद अखबार मालिक बन गए हैं।
सड़कों पर अपने भविष्य की लड़ाई
लड़ता देश का भविष्य कागजों पर अपना भविष्य उकेर रहा है। ये कहानी है
बालकनामा की जिसने भटकते बचपन को एक नयी राह दी है। बालकनामा में कहानियां
ढूंढने और लिखने से लेकर अखबार छापने तक में ये बच्चे लगे हैं।
'बालकनामा'
को चलाने वाला एनजीओ 'चेतना' बच्चों के भविष्य की तलाश में अहम रोल अदा कर
रहा है। असल में बालकनामा एक अखबार है जो बीते 10 साल से छप रहा है जिसे
पूरी तरह से बच्चे ही चलाते हैं। इसके पीछे बच्चों का ही आइडिया है। वह
अपनी बात कहना चाहते हैं।