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'ट्रेनों से नहीं भूख से डर लगता है साहब'

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तेज रफ्तार ट्रेन से भी डर नहीं लगता, इन्हें डर लगता है तो भूख से। इनकी नजर रहती है तो सिर्फ प्लास्टिक की खाली पानी की बोतल पर। बात हो रही है उन बच्चों की जो भूखे पेट के लिए प्लेटफार्म और रेलवे ट्रैक से पानी की खाली बोतलें बीनते हैं।
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ट्रेनों से फेंकी गई खाली बोतलों को इकट्ठा करने के लिए ये बच्चे जान भी दांव पर लगा देते हैं। इन्हीं बोतलों को बेचकर ये बच्चे अपना और अपने परिवार का गुजारा करते हैं। इनमें से ज्यादातर का स्टेशन ही आशियाना है।

दो जून की रोटी कमाने की यही मजबूरी इन्हें रोज स्टेशन पर खतरों के बीच धकेल देती है। विजय नगर क्षेत्र के रहने वाले ये बच्चे ट्रेनों के गाजियाबाद से गुजरने का इंतजार करते हैं।
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नहीं देखी स्टेशन के बाहर की दुनिया

ट्रेनों से फेंकी जाने वाली प्लास्टिक की खाली बोतलों को उठाने के लिए इनमें इस कदर होड़ मचती है कि कई बार ये चलती ट्रेनों के पीछे भागकर यात्रियों की फेंकी बोतल और रेपर्स बीनते हुए पटरियों पर दौड़ लगाते हैं।

प्रतिदिन करीब पौने दो लाख यात्रियों के आवागमन वाले इस स्टेशन पर लोगों और रेलवे अधिकारियों की नजर इन बच्चों पर जाती तो है, मगर हर कोई इसे अनदेखा करके आगे बढ़ जाता है।

छह साल की उम्र में खेल रही खतरों से -विजय नगर की छह साल की रोशनी के पिता रिक्शा चलाते हैं। इस कमाई से बमुश्किल घर चलता है। रोशनी भी मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ रोजाना स्टेशन पर जाती है।

बोतलें उठाने और यात्रियों से मांगकर प्रतिदिन 80 से 100 रुपये इकट्ठा कर घर ले जाती है। इसी तरह अल्पना (10) भी विजय नगर से स्टेशन पर आती है। इस रकम के लिए इन बच्चों की जिंदगी रोजाना दांव पर लगती है।

एक खाली बोतल के लिए कूद जाते हैं ट्रैक पर

एसएसआई जीआरपी पंकज लवानिया ने बताया कि बच्चों को ट्रैक पर आने से बार-बार रोका जाता है। पुलिसकर्मियों को देख बच्चे भाग जाते हैं। लेकिन दो-चार घंटे बाद फिर आ जाते हैं। बच्चों के परिजनों को बुलाकर समझाया जाएगा।

स्टेशन पर कबाड़ बीनने वाले किशनपाल(11) ने बताया कि पिता छोटा-मोटा काम कर परिवार चलाते हैं। इसीलिए वह सुबह से शाम तक स्टेशन पर प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करता दिनभर में चार से पांच किलो प्लास्टिक इकट्ठा हो जाने से उसे 125 से 150 रुपये मिल जाते हैं।

पांच साल की रिमझिम, विनोद, साहिल की दुनिया भी स्टेशन और पास की झुग्गियों तक सिमटी है। रोज स्टेशन आना और प्लास्टिक बेचना इनकी जिंदगी का हिस्सा है। साथी बच्चों के साथ खेलना, स्कूल जाना इनके लिए सपने जैसा है।
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इस नर्क से कैसे उबरेंगे ये बच्चे

लक्ष्मी संस्था के प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर सतीश कुमार चौहान का कहना है कि बच्चों और उनके परिजनों की काउंसलिंग करेंगे। उन्हें इस जोखिम में न डालने के प्रति जागरूक करेंगे। संस्था और सरकारी तंत्र स्तर पर मदद दिलाकर बेहतर भविष्य बनाने की दिशा में काम किया जाएगा।

डीएम विमल कुमार शर्मा ने बताया कि श्रम विभाग के अधिकारियों को भेजकर बच्चों और परिजनों को जागरूक किया जाएगा। मामले की जांच कराई जाएगी कि बच्चों से कोई जबरन काम तो नहीं करा रहा। रेलवे स्टेशन पर अफसरों की टीम भेजी जाएगी।
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