वाजिद अली लंबी मेडिकल लीव के बाद पंद्रह दिन पहले ही दोबारा नौकरी पर लौटे थे। हालांकि नियमों के तहत मेडिकल लीव के बाद डिपो मैनेजर को अपने स्तर पर मेडिकल फिटनेस की जांच करवानी होती है।
यदि एमबीबीएस डॉक्टर की रिपोर्ट सही पाई जाए तो ही पूरी कागजी कार्रवाई के बाद ड्र्राइवर दोबारा स्टेयरिंग संभालता है। हालांकि शुरुआती जांच में ड्राइवर दिल की बीमारी के तहत मेडिकल ग्राउंड पर छुट्टी लेकर गया था।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रबंधन ने मेडिकल जांच करवाई थी या नहीं? दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन और डिम्ट्स की बस राजधानी समेत एनसीआर में अपनी सेवाएं देती हैं, जिसमें करीब प्रतिदिन 55 लाख से अधिक यात्री सफर करते हैं।
लाखों यात्रियों समेत राहगीरों की जिंदगी खतरे में है
हालांकि लाखों यात्रियों समेत राहगीरों की जिंदगी खतरे में है। क्योंकि नौकरी मिलने से पहले मेडिकल फिटनेस जांच के बाद दोबारा कभी जांच नहीं की जाती है।
जबकि ऐसे मरीजों को नियमों के तहत स्टेयरिंग नहीं दिया जाना चाहिए था, क्योंकि उनके कंधों पर लाखों यात्रियों के साथ राहगीरों की सुरक्षा का भी जिम्मा होता है।
यदि हर तीन या छह महीने के बाद मेडिकल जांच का प्रावधान होता तो यह दर्दनाक हादसा न होता। डीटीसी में 55 वर्ष की आयु पूरा करने के बाद ही मेडिकल फिटनेस जांच का प्रावधान है।
ये भी है एक बड़ा सवाल
वो भी तब यदि ड्राइवर दोबारा पांच वर्षों के लिए डीटीसी को अपनी सेवाएं देना चाहता है। हालांकि इन पांच वर्षों में प्रतिवर्ष उसे मेडिकल फिटनेस जांच करवानी होती है, लेकिन 55 आयु वर्ग से पहले कभी किसी ड्राइवर की मेडिकल जांच नहीं होती है।
सूत्रों के मुताबिक, करीब 40 फीसदी ड्राइवर हाई ब्लड़ प्रेशर, दिल, हाइपरटेंशन के मरीज हैं, लेकिन उनकी बीमारी को अनदेखी करते हुए उनकी सेवाएं ली जा रही हैं। डीटीसी बसों में ड्राइवरों की आंखों की बीमारी पर कई बार प्रश्नचिह्न लग चुके हैं। हालांकि प्रबंधन इस पूरे आरोपों को खारिज कर चुका है।
परिवहन मंत्री गोपाल राय ने परिवहन आयुक्त से 72 घंटों में मामले की रिपोर्ट मांगी है। इस पूरे मामले की जांच डिप्टी कमिश्नर आपरेशन योगेश प्रताप करेंगे। प्रारंभिक रिपोर्ट गोपाल राय को सौंप दी गई है, इस रिपोर्ट में घटनास्थल की वीडियोग्राफी, चश्मदीदों के बयान शमिल हैं।