12 साल से छोटी बच्चियों से सामूहिक दुष्कर्म के लिये मौत की सजा देने के प्रस्तावित संशोधन विधेयक को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह अमानवीय तथा गैर संवैधानिक प्रस्ताव है और इसे खारिज किया जाना चाहिये।
बच्चियों से रोकथाम के लिये एनएचआरसी को महिला सदस्य की अगुवाई में कमेटी बनानी चाहिये। कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति गीता मित्तल व न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की खंडपीठ ने पेश याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
कोर्ट ने मामले में सहायता के लिये अपर्णा चंद्रा को न्याय मित्र नियुक्त किया है। याचिका पर सुनवाई के लिये 31 जुलाई की तारीख तय की गई है। पेश याचिका दायर कर एनजीओ सोशल एक्शन फोरम फोर मानवाधिकार (साफमा) के लिये अधिवक्ता ने चारू वलीखन्ना ने कहा कि बच्चियों से दुष्कर्म व सामूहिक दुष्कर्म की घटनाओं को रोकने के लिये उपाय सुझाने के लिये महिला सदस्य की अगुवाई में कमेटी बनाने का निर्देश एनएचआरसी को दिया जाये।
याचिका में कहा गया है कि निर्भया गैंग रेप के बाद बनाई गई जेएस वर्मा कमेटी ने दुष्कर्म मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई व दुष्कर्म के दोषियों को कड़ी सजा देने की सिफारिश की थी।
इस कमेटी ने 2013 में आई रिपोर्ट में कहा था कि दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सजा का प्रावधान करना एक अप्रगतिशील कदम होगा। सरकार ने इन सिफारिशों के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाये थे और दुष्कर्म के बाद हत्या के मामलों में दोषियों के लिये कानून में मौत की सजा का प्रावधान किया था।