चीन, बांग्लादेश सहित कई एशियाई देशों में परेशानी का सबब बने ई-रिक्शा भारत में भी मुसीबत बन रहे हैं। शहर की तंग सड़कों पर पहले से खचाखच भरे वाहनों की भीड़ में दो हजार ई-रिक्शा चलवाने से पहले कोई प्लानिंग नहीं की गई।
ई-रिक्शा चालकों से लेकर ट्रैफिक पुलिस को इनके संचालन के पहले औपचारिक ट्रेनिंग देना भी पुलिस और प्रशासन के अफसरों ने जरूरी नहीं समझा। अब बिना आवाज और बिना हॉर्न वाला ई-रिक्शा लोगों के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है।
कोई रास्ता निकालने की बजाय अफसर धड़ल्ले से ई-रिक्शा बांट रहे हैं और यह कहकर पल्ला भी झाड़ ले रहे हैं कि ऊपर से कोई गाइडलाइन नहीं है तो हम क्या करें।
दिल्ली में ई-रिक्शा की चपेट में आकर हुई मासूम की मौत ने ई-रिक्शा के संचालन पर सवाल खड़ा कर दिया है। छह से आठ सवारियां भरकर सड़क पर सरपट दौड़ने वाली इन रिक्शाओं पर मोटर व्हीकल एक्ट भी लागू नहीं होता।
कारण न तो इन्हें आरटीओ से पंजीकृत कराना होता है और न ही इसके चालक को डीएल की आवश्यकता है। ऐसे में नाबालिग भी धड़ल्ले से इनका संचालन करते हैं। नियम-कानूनों के चलते ई-रिक्शा पर कार्रवाई करने में पुलिस प्रशासन के भी हाथ बंधे हुए हैं।
यही कारण है कि ई-रिक्शा महानगर के ट्रैफिक सिस्टम पर भी भारी पड़ रहा है। दो साल पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट में शामिल हुए ई-रिक्शा को ईको-फ्रेंडली ट्रैफिक व्हीकल के रूप में देखा जा रहा था। बैटरी से चलने वाले इस रिक्शा को पैर चलित रिक्शा के स्थान पर लगाया जा रहा है।
शासन ने पैरों से चलने वाले रिक्शा चलाने वाले लोगों को फ्री में ई-रिक्शा देने की योजना भी तैयार की है। इसके लिए नगर निगम में 230 रिक्शा चालकों ने पंजीकरण करा दिया है।
टीएचए में विंडसर एंड नोवा सोसायटी की आरडब्ल्यूए ने दो वर्ष पहले ई-रिक्शा शुरू किया गया था, जिससे गेट से घरों तक बुजुर्गों को पहुंचाया जा सके, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया। आरडब्ल्यूए अध्यक्ष गोपाल पांडे ने बताया कि ई-रिक्शा के खतरों को देखते हुए इसे शुरू करने के कुछ ही दिन बाद बंद कर दिया गया था।
सोसाइटी में बिना आवाज और हॉर्न वाले यह रिक्शा तेजी से आते थे। ऐसे में कई बार यहां हादसे होने से बचे हैं। बैटरी से संचालित होने के चलते इनके स्टार्ट होने का भी पता नहीं चलता।