नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण (बीएए) अनिवार्य करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और तेल-गैस कंपनियों से जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई सोमवार (5 अक्टूबर) को करेगी।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस देश में हर किसी के पास आधार नहीं है, लेकिन वे भी एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं। याचिकाकर्ता पुलकित लूथरा (जो 75 प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं और एक वकील हैं) ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के 17 सितंबर के पत्र और 19 सितंबर के प्रेस रिलीज को चुनौती दी है। इनके अनुसार 1 अक्टूबर से घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं को नियंत्रित कीमत पर रिफिल बुक करने के लिए बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य कर दिया है। लूथरा का तर्क है कि विशेष रूप से आंखों के पलक झपकाने वाले आइरिस प्रमाणीकरण से दृष्टिबाधित व्यक्तियों को गंभीर कठिनाई होती है। उन्होंने कहा कि जो उपभोक्ता प्रमाणीकरण नहीं कर पाते या नहीं करना चाहते, उन्हें बाजार मूल्य पर 5 किलो या 10 किलो के सिलेंडर उपलब्ध कराए जाएंगे। यह विकल्प पर्याप्त नहीं है क्योंकि इससे उपभोक्ताओं को न सिर्फ सब्सिडी वाली कीमत से वंचित होना पड़ेगा, बल्कि नियमित 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर से भी वंचित होने का खतरा है।याचिका में कहा गया है कि यह अनिवार्य आधार प्रमाणीकरण आधार अधिनियम, 2016 की धारा 7 की अनुमति से परे है और सुप्रीम कोर्ट के केएस पुट्टास्वामी फैसले में मान्यता प्राप्त निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। साथ ही यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 तथा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का भी उल्लंघन करता है।