बचपन की दिवाली और आज की दिवाली में बड़ा बदलाव दिखाई देता है। बचपन में इस त्योहार के आने से कई दिन पहले ही पटाखे जलाना, नए कपड़ों की खरीदारी और मौजमस्ती का दौर शुरू हो जाता था। अब सब कुछ बदल गया है। पहले अपने परिवार के साथ दिवाली मनाते थे, अब जनता ने मेरी जिम्मेदारियां बढ़ा दी हैं।
ऐसे में अब परिवार का दायरा बढ़ गया है। रोशनी के इस पर्व पर अब मेरी कोशिश जनता के चेहरे पर खुशियां लाने की होती है। यह कहना है राज्य की मुख्य संसदीय सचिव एवं बड़खल विधानसभा क्षेत्र की विधायक सीमा त्रिखा का।
सीमा त्रिखा का बचपन फरीदाबाद में ही बीता। स्कूली शिक्षा के बाद कॉलेज की पढ़ाई और फिर एक शिक्षिका के तौर पर देश के भविष्य को संवारने का काम उन्होंने इसी शहर में रहकर किया। समाज से जुड़े रहने का शौक बचपन से था और यही उन्हें राजनीति की तरफ खींच लाई।
बकौल त्रिखा, 'जब छोटे थे तो भाई-बहन मिलकर खूब एंज्वाय करते थे। पिता केसी मल्होत्रा हर ख्वाहिश पूरी करते थे। पटाखे जलाने और नए कपड़े पहनने का शौक हर त्योहार को पूरा किया करते थे। जैसे जैसे दायित्व बढ़ता गया सब पीछे छूटता गया।
हालांकि, दिवाली पर परिवार के साथ विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इसके बाद पति अश्विनी त्रिखा के साथ लोगों से मिलने जुलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस बार भी दिवाली से पहले और दिवाली के दिन कई कार्यक्रम हैं, जहां लोगों से व्यक्तिगत तौर पर मिलकर त्योहार की खुशियां बांटी जाएंगी।
संकल्प:-
दिवाली न केवल धार्मिक पर्व है बल्कि सामाजिक पर्व भी है। मुझे लगता है कि मैं शहर की बेटी हूं और इस नाते मैं चाहूंगी कि शहर का प्रत्येक परिवार इस पर्व पर खुशहाल हो। जनता की उम्मीदों पर खरा उतर साफ-सुथरा व सुरक्षित वातावरण देना मेरी कोशिश होगी।
संदेश:-
आज हम इंडिया से भारत में तब्दील हो रहे हैं। इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी और कर्तव्य भी बढ़ गए हैं। रोशनी के इस पर्व में हमें उन शहीदों को भी याद रखना चाहिए। जिनकी वजह से हम सुरक्षित तरीके से त्योहार मनाते हैं।