दिल्ली की एक अदालत ने 31 साल पुराने जासूसी मामले में गोपनीय रक्षा दस्तावेज लीक करने के आरोपी पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारी समेत दो लोगों को बरी कर दिया। फैसला सुनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि सीबीआई यह साबित करने में नाकाम रही कि उन दस्तावेज को गोपनीय दस्तावेज के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
तीस हजारी अदालत की विशेष सीबीआई न्यायाधीश कामिनी लाउ ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह से नाकाम रहा कि संबंधित दस्तावेज को गोपनीय दस्तावेज घोषित किया गया था। साथ ही अदालत ने कहा कि एजेंसी इस मामले में साजिश की बात साबित करने में भी नाकाम रही।
अदालत ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि ये दस्तावेज गोपनीय नोट थे, तो उनके अन्य स्रोत से लीक होने की संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता। लिहाजा अदालत ने वर्ष 1987 में केंद्र के अंतर्गत आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग में सलाहकार के रूप में कार्यरत एन. डब्ल्यू नेरूरकर और एक अन्य व्यक्ति आदित्य कुमार जजोदिया (जो कि इस मामले के आरोपी हैं) को बरी कर दिया।
नेरूरकर और जजोदिया दोनों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक साजिश तथा आधिकारिक गोपनीयता कानून के तहत जासूसी तथा गलत ढंग से सूचना देने के संबंध में मामला दर्ज किया गया था। सीबीआई ने दिल्ली की एक कोरियर कंपनी से शिकायत मिलने के बाद 17 अप्रैल, 1987 को मामला दर्ज किया था। शिकायत में कहा गया था कि आरोपियों द्वारा रक्षा मामलों से संबंधित कुछ गोपनीय दस्तावेज को भेजा जा रहा था।
इस मामले में डॉक्टर नारायण वमन नेरूरकर, ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) राजपाल सिंह देयोल, दिल्ली स्थित फर्म विलियम जैक्स के कृष्ण कुमार जजोदिया और उनके कर्मचारी किझूवारा वेणुगोपालन का नाम आरोपी के रूप में शामिल किया गया था। इससे पहले अदालत ने वेणुगोपालन को आरोपमुक्त किया था और देयोल तथा कृष्ण जाजोदिया की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी, जिसके कारण उनके खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी गई थी।