हाईकोर्ट ने नर्सरी दाखिला मामले में निजी स्कूलों को राहत प्रदान की है। वहीं, दिल्ली सरकार द्वारा दाखिलों में तय नेबरहुड नीति को असंवैधानिक व मनमाना करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति जनहित में नहीं है।
इससे एक वर्ग विशेष के लोगों व उनके बच्चों को लाभ प्रदान किया किया है। इस नीति से जहां भेदभाव बढ़ेगा, वहीं पारदर्शिता कम होगी। अदालत ने सरकार की नीति पर रोक लगाते हुए निजी स्कूलों की नीति पर दाखिलों का रास्ता साफ कर दिया।
न्यायमूर्ति मनमोहन ने 58 पृष्ठों के फैसले में कहा कि सरकार की ओर से दाखिलों के लिए 7 जनवरी को जारी अधिसूचना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। ऐसे में इस पर रोक लगाना जरूरी है। अदालत ने मामले पर अगली सुनवाई 21 मार्च तय की है। इससे पूर्व अदालत ने अल्पसंख्यक स्कूलों में नेबरहुड नीति लागू करने पर भी रोक लगा दी थी।
अदालत ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया
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- फोटो : अमर उजाला
अदालत ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया कि यह निर्णय जनहित में लिया गया है। अदालत ने कहा कि नेबरहुड नीति को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग व विशेष वर्ग के बच्चों के दाखिलों के समान लागू नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा तय कानून व शर्तों के अनुसार सरकार से सस्ती दरों पर भूमि लेने वाले स्कूल 25 प्रतिशत सीटों पर तय शर्तों के अनुसार दाखिला देंगे। लेकिन, शेष 75 प्रतिशत सीटें वे आसपास यानी नेबरहुड या दूर के क्षेत्रों के बच्चों को दाखिला देकर भरने के लिए स्वतंत्र हैं।
अदालत ने कहा कि शिक्षा निदेशालय भूमि आवंटन पत्र की परिभाषा चार दशक बाद तय नहीं कर सकता। यह काम भूमि आवंटित करने वाली एजेंसी यानी डीडीए का है। मगर, वह भी तीन से चार दशक बाद ऐसा नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा कि सरकार ने यातायात, वायु प्रदूषण व बच्चों के स्वास्थ्य को आधार बताकर मामले को जनहित बताया है। मात्र 298 स्कूलों के लिए नीति लागू कर इसे जनहित में नहीं ठहराया जा सकता।
बच्चों के साथ समानता के अधिकार का उल्लंघन है
नर्सरी दाखिला प्रक्रिया शुरु
अदालत ने कहा अन्य 1400 स्कूलों के बच्चों पर यह नीति लागू न करना, उन बच्चों के साथ समानता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि प्रबंधन कोटे के आड़ में स्कूलों सीटों की बिक्री करते हैं। कोर्ट ने कहा कि पिछले वर्ष उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि ऐसे आरोप की जांच कर कार्रवाई की जा सकती है।