नर्सरी दाखिलों को लेकर सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के खिलाफ अभिभावक भी हाईकोर्ट पहुंच गए है। निजी स्कूलों व अभिभावकों ने तर्क रखा कि सरकार के रवैये से अभिभावकों को अपना स्कूल इच्छानुसार चुनने के मौलिक अधिकारों का हनन होता है तो स्कूलों को भी शिक्षा की गुणवत्ता बनाने के अधिकार में परेशानी आती है। फिलहाल अदालत ने स्कूलों को कोई राहत नहीं दी।
न्यायमूर्ति वीके राव के समक्ष स्कूलों की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष पिछले दस वर्षो से लेकर अब तक हुई सुनवाई का विवरण पेश किया। उन्होंने कहा हर बार सरकार आंखें बंद कर निर्णय करती है।
उन्होंने स्कूलों का भी मानना है कि दाखिलों में नेवरहुड को प्राथमिकता मिलनी चाहिए लेकिन स्कूलों को शिक्षा की क्वालिटी व गुणवत्ता बनाई रखना जरूरी है। बच्चों को किस स्कूल में पढ़ाना है यह अतधिकार अभिभावकों को मिलना चाहिए। यह उनका मौलिक अधिकार भी है।
उन्होंने कहा हर स्कूल में दाखिलों की अलग् प्राथमिकता है। कुछ में खेल तो कुछ में साइंस, आर्ट इत्यादि विषय को प्राथमिकता दी जाती है। उच्च शिक्षा के लिए आप स्कूल में दाखिलों के लिए दूरी मापदंड तय नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा सरकार ने यह आदेश मात्र सरकार से सस्ती दरों पर जमीन लेने वाले स्कूलों के लिया दिया है। यदि नेबरहुड को प्राथमिकता देनी है तो सभी स्कूलों में यह लागू होनी चाहिए। वहीं स्कूलों को अपनी स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता का भी ध्यान रखना पड़ता है।
उन्होंने कहा हर बच्चे को यह तय करने का अधिकार है कि वह किस स्कूल में पढ़े। नेवरहुड स्कीम से उसके इस मौलिक अधिकार का हनन होगा। वह जिस स्कूल में पढ़ता चाहता है वह स्वयं करता है नेवरहुड प्रक्रिया से वह अपने इस अधिकार से वंचित हो जाएगा। ऐसे में सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को रद्द किया जाए। अदालत ने मामले की सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी।
कुल चार याचिकाएं दायर
नर्सरी दाखिलों को लेकर चार याचिका दायर की गई है। इनमेंसे दो स्कूलों की एसोसओएशन ने दायर की है जबकि दो याचिका अभिभावकों ने दायर की है।