कोरोना के नाम लाइसेंस फीस की गई माफ
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन इलाकों में शराब की दुकानें खोलने की इजाजत नहीं थी (नॉन कंफर्मिंग एरिया), वहां तत्कालीन सरकार ने लाइसेंस दे दिया। बाद में लैंडयूज में बदलाव न होने से जब इन इलाकों में दुकान खोलने की अनुमति नहीं मिली, तो कई लाइसेंस धारकों को दुकानें बंद करनी पड़ीं। मामला अदालत में गया। अदालत ने 67 वार्डों में शराब दुकानों के लाइसेंस शुल्क को माफ करने का आदेश दिया। इससे सरकार को 941.53 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। वहीं, सरेंडर कर दिए गए लाइसेंस का फिर से टेंडर न करने से 890.15 करोड़ का घाटा हुआ। कोरोना के नाम पर लाइसेंस फीस माफ करने के तत्कालीन सरकार के फैसले से 144 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। सुरक्षा जमा राशि भी सही तरीके से नहीं ली गई। इससे सरकारी राजस्व को 27 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
लाइसेंस फीस के रूप में सरकार को वित्तीय नुकसान
सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जोनल लाइसेंस धारकों ने अपने लाइसेंस सरेंडर कर दिया था। आबकारी विभाग ने इसका फिर से टेंडर जारी नहीं किया। इस वजह से इन जोन से मिलने वाली लाइसेंस फीस के रूप में सरकार को 890.15 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। इसी तरह कोविड-19 के कारण 28 दिसंबर 2021 से 4 जनवरी 2022 तक शराब की दुकानें बंद रही थीं। लाइसेंस धारकों ने लाइसेंस फीस में छूट की मांग की। आबकारी और वित्त विभाग ने इस छूट का विरोध किया क्योंकि टेंडर दस्तावेजों में इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी ही नहीं। तत्कालीन शराब मंत्री मनीष सिसोदिया ने फिर भी यह छूट लाइसेंस धारकों को दे दी। इस वजह से दिल्ली सरकार को 144.50 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था।
. थोक विक्रेताओं के मार्जिन को 5 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी कर दिया गया। इससे शराब की क्वालिटी व राजस्व गिर गया।
. ''आप'' सरकार ने खुदरा शराब लाइसेंस बिना उचित जांच के दे दी, आपराधिक रिकॉर्ड का ध्यान नहीं रखा गया।
. शराब जोन चलाने के लिए 100 करोड़ से ज्यादा का शुरुआती निवेश लगता है, वित्तीय पात्रता मानदंड नहीं रखा गया।
. ''आप'' सरकार ने अपनी खुद की एक्सपर्ट कमेटी की 2021-22 की एक्साइज पॉलिसी पर फैसला लिया, सिफारिशों को नजरअंदाज किया गया।
. पारदर्शिता का अभाव रहा। एकल आवेदक को 54 शराब की दुकानों को संचालित करने की अनुमति दे दी गई
. नई नीति के तहत 32 रिटेल जोन बनना था, जिसमें 849 वेंड्स शामिल थे, लेकिन केवल 22 निजी संस्थाओं को लाइसेंस मिला।
. ''आप'' की नीति निर्माताओं को एक ही थोक विक्रेता के साथ टाई-अप करने के लिए मजबूर किया।
. 367 पंजीकृत आईएमएफएल ब्रांडों में से केवल 25 ब्रांडों ने दिल्ली की कुल शराब बिक्री का करीब 70 फीसदी हिस्सा रखा गया। इंडोस्पिरिट, महादेव लिकर, और ब्रिंडको ने 71 फीसदी से अधिक आपूर्ति पर नियंत्रण किया। इन्ही 3 थोक विक्रेताओं के पास 192 ब्रांड्स के एक्सक्लूसिव सप्लाई राइट्स भी थे, जिसे ये तय कर सकते थे, ब्रांड सफल होंगे और कौन से नहीं। शराब के
दाम कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया।
. निरीक्षण टीमों ने जोन 23 के 4 दुकानों को वाणिज्यिक क्षेत्रों से गलत तरीके से जोड़ा
. आबकारी विभाग ने एल-1 लाइसेंसधारियों को महंगी शराब के लिए सलाह दी। एक्स-डिस्टिलरी कीमत तय करने से कीमत में हेराफेरी का दरवाजा खुल गया।
. जनता को खतरे में डाला गया, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के मानदंडों का पालन नहीं किया।
. उत्पाद शुल्क खुफिया ब्यूरो (ईआईबी) देसी शराब की तस्करी रोकने में असफल रहा।
. एफआईआर विश्लेषण से पता चला कि कुछ खास इलाकों में बार-बार तस्करी हो रही थी, फिर भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया।
. खराब डेटा प्रबंधन और अवैध शराब व्यापार को बढ़ावा मिला।
. आधुनिक डेटा एनालिटिक्स और एआई का उपयोग करने के बजाय, आप की उत्पाद नीति पुरानी और अप्रभावी ट्रैकिंग विधियों पर निर्भर थी।