कॉकलियर इम्प्लांट के लिए सबसे अहम है जल्दी इस तकलीफ को पहचानना और सही इलाज कराना। अगर आपको लगता है कि आपका बच्चा बहरपेन का शिकार है तो इंतजार मत कीजिए। भारत में जो भी बच्चा जन्म ले, उसका यूनिवर्सल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग हियरिंग (सुनने की शक्ति की जांच) टेस्ट से गुजरे, ताकि बीमारी की पहचान जल्द हो सके। अगर कोई दिक्कत बच्चे को है, द हंस फाउंडेशन उनकी मदद कर सकता है। द हंस फाउंडेशन इस दिशा में शानदार कार्य कर रहा है।
वे मूक-बधिर बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। ब्रेट ली ने कहा कि मैंने इस क्षेत्र में काम करने का फैसला किया, क्योंकि यह कार्य मेरे दिल के बेहदकरीब है। कॉकलीयर इम्प्लांट बेहद महंगा होता है, लेकिन इसका खर्च उठाना तो दूर की बात है बहुत से माता-पिता तो अपने बच्चों के लिए डिवाइस तक खरीद पाने में असमर्थ महसूस करते हैं। ऐसे लोगों की मदद के लिए द हंस फाउंडेशन बढ़चढ़ कर कार्य कर रहा है।
इस प्रोग्राम के तहत एक बच्चे के इम्प्लांट पर करीब 8 लाख रुपये का खर्च आता है। द हंस फाउंडेशन (THF) ने जन्मजात बहरेपन की बीमारी से जूझ रहे बच्चों के इलाज और कॉकलीयर इम्प्लांट के लिए गुड़गांव के कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल, नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल और नई दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल के साथ हाथ मिलाया है।