सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदार और कर्णिका साहनी ने जनहित याचिका दायर कर दिल्ली में भिखारियों को मूलभूत सुविधाएं देने और भिक्षावृत्ति को अपराध के दायरे से बाहर लाने की मांग की थी। इन याचिकाओं में भिखारियों के लिए भोजन और चिकित्सा सुविधाएं देने का भी आग्रह किया था।
बांबे भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम को भी इन याचिकाओं में चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने जवाब में कहा था कि भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए बांबे भिक्षावृत्ति रोकथाम में कई प्रावधान हैं। हालांकि सरकार ने यह भी कहा था कि गरीबी के कारण भीख मांगने को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। सरकार इसे अपराध बनाने पर विचार नहीं कर रही है।
यह है कानूनी प्रावधान
बांबे के कानून के मुताबिक, पहली बार पकड़े जाने पर भिखारी को अदालत एक से तीन साल के लिए सुधार भेज सकती थी। दूसरी बार पकड़े जाने पर भिखारी को 10 साल के लिए सुधार गृह भेजने का प्रावधान है।
सरकार ने लिया था यू-टर्न
हाईकोर्ट के समक्ष केंद्र व दिल्ली सरकार ने अक्तूबर 2016 में कहा था कि केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय ने भिक्षावृत्ति को अपराध के दायरे से बाहर लाने तथा भिखारियों व बेघरों के पुनर्वास के लिए कानून में संशोधन का मसौदा तैयार किया है। हालांकि सरकार ने बाद में यह प्रस्ताव रद्द कर दिया था।
फैसले से बढ़ेगी भिक्षावृत्ति की लत
जानकारों की मानें तो हाईकोर्ट के फैसले से जहां एक ओर गरीबी के कारण भीख मांगने वालों को पुलिस कार्रवाई से राहत मिलेगी तो वहीं दूसरी ओर इससे भिखारियों की समस्या ज्यादा बढ़ेगी। अब भिखारी बिना रोकटोक के सड़कों, बसों, ट्रेन, धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों पर भीख मांगेंगे।