फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Delhi: आरएमएल में थैलेसीमिया रोगी का बोन मैरो प्रत्यारोपण जल्द, जिंदगी भर खून चढ़ाने से मिल सकती है राहत

Wed, 08 May 2024 07:59 AM IST
विजय पुंडीर राकेश शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में थैलेसीमिया के मरीजों के लिए विशेष क्लीनिक चला रहे बाल रोग विभाग के निदेशक व प्रोफेसर डॉ. आलोक हेमल का कहना है कि अस्पताल में बोन मैरो प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
विज्ञापन
आरएमएल - फोटो : एएनआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अपनों से मिले बोन मैरो से थैलेसीमिया के मरीजों को जिंदगी भर खून चढ़ाने की परेशानी से राहत मिल सकती है। एम्स के बाद आरएमएल अस्पताल में एलोजेनिक बोन मैरो प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू होगी। इस तकनीक में परिवार के सदस्य या भाई-बहन से बोन मैरो लिया जाता है।

विज्ञापन


इसके प्रत्यारोपण से पहले बोन मैरो देने वाले दान दाता और प्राप्तकर्ता मरीज के जीन को मैच करके देखा जाता है। जांच के दौरान जीन मैच हो जाता है तो आगे की प्रकिया की जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक की मदद से थैलेसीमिया के मरीजों की परेशानी को 80 फीसदी तक दूर किया जा सकता है। शोध बताते हैं कि इस प्रत्यारोपण के बाद मरीजों को जिंदगी भर खून चढ़ाने की तकलीफ से राहत मिल जाती हैं।

डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में थैलेसीमिया के मरीजों के लिए विशेष क्लीनिक चला रहे बाल रोग विभाग के निदेशक व प्रोफेसर डॉ. आलोक हेमल का कहना है कि अस्पताल में बोन मैरो प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू करने की तैयारी की जा रही है। उम्मीद हैं कि एक साल में यह सुविधा शुरू हो सकती है। मौजूदा समय में यह सुविधा एम्स व राजीव गांधी कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र में उपलब्ध है। इस प्रत्यारोपण में 10-15 लाख रुपये का खर्च आता है।
विज्ञापन


राहत की बात है कि कोल इंडिया ऐसे मरीजों को करीब दस लाख रुपये की मदद भी देता है। डॉ. हेमल ने कहा कि इस सुविधा में एलोजेनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें भाई-बहन या परिवार के किसी सदस्य से ही बोन मैरो लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आरएमएल में जीन की जांच के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में बोन मैरो लेने से पहले की जांच यहां आसानी से हो सकती है।  थैलेसीमिया के मरीजों के लिए खून की कमी की समस्या अब कम होने लगी है। कोरोना महामारी के बाद अचानक आए रक्तदान में कमी का स्तर सुधर रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि कई जगहों पर रक्तदान शिविर की स्थिति सामान्य हो गई है। थैलेसीमिया के मरीजों को जिंदगी भर खून चढ़ाने की जरूरत रहती है।

छह माह के बच्चे में हो सकती है पहचान 
यदि माता-पिता में थैलेसीमिया की कोई हिस्ट्री रही है तो उनके बच्चे की जांच जरूर करवानी चाहिए। छह माह के बच्चे में थैलेसीमिया की पहचान हो सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय पर ऐसे मरीजों का इलाज शुरू नहीं होता तो दिक्कत बढ़ सकती है। बच्चे को खून चढ़ाने के साथ शरीर का पीला होना, कमजोरी सहित दूसरी परेशानी हो सकती है। 

क्या है थैलेसीमिया विकार 
थैलेसीमिया एक वंशानुगत रक्त विकार है जो मरीज के शरीर की हीमोग्लोबिन और स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन करने की क्षमता को प्रभावित करता है। थैलेसीमिया के कारण मरीज को एनीमिया जैसे लक्षणों का अनुभव हो सकता है जो हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें